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Wednesday, 20 December 2017

समास

समास का अर्थ है ‘संक्षिप्तीकरण’। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नये और सार्थक शब्द को समास कहते हैं । जैसे- कमल के समान नयन  इसे हम कमलनयन  भी कह सकते हैं। समास के नियमों से बने शब्द सामासिक शब्द कहलाते हैं । इसे समस्तपद भी कहते हैं । समास होने के बाद विभक्तियों के चिह्न (परसर्ग) लुप्त हो जाते हैं । जैसे- राजा का सिंहानसन यानी राजसिंहासन ।

समास-विग्रह
किसी सामासिक शब्दों का खंडन समास-विग्रह कहलाता है । जैसे- रसोईघर- रसोई का घर । पूर्वपद और उत्तरपद- समास में दो पद (शब्द) होते हैं । पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं ।
जैसे- नीलकमल । इसमें नील पूर्वपद और कमल उत्तरपद है ।


समास के भेद

  1. अव्ययीभाव समास 
  2. तत्पुरुष समास 
    1. कर्म तत्पुरुष
    2. करण तत्पुरुष
    3. संप्रदान तत्पुरुष
    4. अपादान तत्पुरुष
    5. संबंध तत्पुरुष
    6. अधिकरण तत्पुरुष
  3. द्वंद्व समास
  4. बहुव्रीहि समास



समास-विग्रह
  1. अव्ययीभाव समास 
    • जिस समास का पहला पद प्रधान हो और वह अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं । जैसे- यथामति (मति के अनुसार),  आमरण (मृत्यु तक) इनमें यथा और आ अव्यय हैं ।
    • उदाहरण-
      • बेशक- शक के बिना
      • यथाक्रम- क्रम के अनुसार
      • हररोज़- रोज़-रोज़
      • आजीवन- जीवन-भर
      • यथासामर्थ्य- सामर्थ्य के अनुसार
      • यथाशक्ति- शक्ति के अनुसार
      • यथाविधि- विधि के अनुसार
      • रातोंरात - रात ही रात में
      • हाथोंहाथ - हाथ ही हाथ में
      • प्रतिदिन - प्रत्येक दिन
      • निस्संदेह - संदेह के बिना
      • हरसाल - हरेक साल
      • याथास्थिति- स्थिति अनुसार
  2. तत्पुरुष समास 
    • जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं ।
    • जैसे- 
      • नवग्रह= नौ ग्रहों का समूह 
  3. कर्मधारय समास
    • जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्ववद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है ।
    • जैसे-
      • चंद्रमुख - चंद्र जैसा मुख कमलनयन कमल के समान नयन
      • देहलता - देह रूपी लता दहीबड़ा दही में डूबा बड़ा
      • नीलकमल - नीला कमल पीतांबर पीला अंबर (वस्त्र)
      • सज्जन - सत् (अच्छा) जन नरसिंह नरों में सिंह के समान
  4. द्विगु समास
    • जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो उसे द्विगु समास कहते हैं। इससे समूह अथवा समाहार का बोध होता है।
    • जैसे-
      • नवग्रह - नौ ग्रहों का मसूह दोपहर दो पहरों का समाहार
        • त्रिलोक - तीनों लोकों का समाहार चौमासा चार मासों का समूह
          • नवरात्र  - नौ रात्रियों का समूह शताब्दी सौ अब्दो (सालों) का समूह
            • अठन्नी - आठ आनों का समूह  
          • द्वंद्व समास
            • जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर और  अथवा या  एवं लगता है,  वह द्वंद्व समास कहलाता है।
            • जैसे-
              • पाप-पुण्य : पाप और पुण्य अन्न-जल अन्न और जल
              • सीता-राम : सीता और राम खरा-खोटा खरा और खोटा
              • ऊँच-नीच :  ऊँच और नीच राधा-कृष्ण राधा और कृष्ण
          • बहुव्रीहि समास
            • जिस समास के दोनों पद अप्रधान हों और समस्तपद के अर्थ के अतिरिक्त कोई सांकेतिक अर्थ प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
            • जैसे-
              • दशानन - दश है आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण
              • नीलकंठ - नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव
              • सुलोचना - सुंदर है लोचन जिसके अर्थात् मेघनाद की पत्नी
              • पीतांबर - पीले है अम्बर (वस्त्र) जिसके अर्थात् श्रीकृष्ण
              • लंबोदर - लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् गणेशजी
              • दुरात्मा  - बुरी आत्मा वाला (कोई दुष्ट)
              • श्वेतांबर - श्वेत है जिसके अंबर (वस्त्र) अर्थात् सरस्वती

          Tuesday, 19 December 2017

          संधि

          दो वर्णों या ध्वनियों के विकार से होने वाले विकार को संधि कहते हैं ।
          जैसे- विद्या+आलय= विद्यालय, सु+उक्ति= सूक्ति, गण+ईश= गणेश ।

          संधि के भेद
          1. स्वर संधि
            1. दीर्घ संधि
            2. गुण संधि
            3. वृद्धि संधि
            4. यण संधि
            5. अयादि संधि
          2. व्यंजन संधि और
          3. विसर्ग संधि


          1. स्वर संधि
          दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं ।
          जैसे- हिम+आलय= हिमालय ।

          स्वर-संधि पाँच प्रकार की होती हैं-
          1. दीर्घ संधि
            • अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ वर्णों के बीच होने वाली संधि दीर्घ संधि कहलाती है । क्योंकि इनमें से वर्ण कोई भी हो संधि दीर्ध हो जाती है । 
            • उदाहरण
              • अ  + अ= आ धर्म + अर्थ= धर्मार्थ
              • अ + आ= आ हिम +आलय= हिमालय
              • आ + अ= आ विद्या + अर्थी= विद्यार्थी
              • आ + आ= आ विद्या + आलय= विद्यालय
              • इ + इ= ई कवि + इच्छा= कवीच्छा
              • ई + इ= ई नदी + ईश= नदीश
              • उ + उ= ऊ भानु + उदय= भानूदय
              • उ + ऊ= ऊ लघु + ऊर्मि= लघूर्मि
              • ऊ + उ= ऊ वधू + उत्सव= वधूत्सव
              • ऊ + ऊ= ऊ वधू + ऊर्जा= वधूर्जा
              • ऋ + ऋ= ऋ मातृ + ऋण= मातृण
          2. गुण संधि
            • गुण-संधि में जब अ, आ वर्ण के आगे अगर इ, ई वर्ण को जोड़ा जाए तो ए वर्ण ; उ, ऊ वर्ण को जोड़ा जाए तो ओ वर्ण और जब ऋ वर्ण जोड़ा जाए तो अर् बनता है । 
            • उदाहरण
              • अ+ इ= ए नर+ इंद्र= नरेंद्र
              • अ+ ई= ए नर+ ईश= नरेश
              • आ+ इ= ए महा+ इंद्र= महेंद्र
              • आ+ ई= ए महा+ ईश= महेश
              • अ+ ई= ओ ज्ञान+ उपदेश= ज्ञानोपदेश
              • आ+ उ= ओ महा+ उत्सव= महोत्सव
              • अ+ ऊ= ओ जल+ ऊर्मि= जलोर्मि
              • आ+ ऊ= ओ महा+ ऊर्मि= महोर्मि
              • अ+ ऋ= अर् देव+ ऋषि= देवर्षि
              • आ+ ऋ= अर् महा+ ऋषि= महर्षि
          3. वृद्धि संधि
            • अ, आ वर्ण का ए, ऐ, औ से मेल होने पर ऐ, औ बनता है । इसे वृद्धि संधि कहते हैं।
            •  उदाहरण
              • अ+ ए= ऐ एक+ एक= एकैक
              • अ+ ऐ= ऐ मत+ ऐक्य= मतैक्य
              • आ+ ए= ऐ सदा+ एव= सदैव
              • आ+ ऐ= ऐ महा+ ऐश्वर्य= महैश्वर्य
              • अ+ ओ= औ वन+ ओषधि= वनौषधि
              • आ+ ओ= औ महा+ औषध= महौषधि
              • अ+ औ= औ परम+ औषध= परमौषध
              • आ+ औ= औ महा+ औषध= महौषध
          4. यण संधि
            • जब इ, ई, उ,ऊ ,ऋ ,ल के आगे कोई स्वर आता है तो ये क्रमश: य्, व्, र्, ल् में बदल जाता है ।
            • उदाहरण
              • इ+ अ= य् अति+ अल्प= अत्यल्प
              • ई+ अ= य् देवी+ अर्पण= देव्यपर्ण
              • उ+ अ= व् सु+ आगत= स्वागत
              • ऊ+ आ= व् वधू+ आगमन= वध्वागमन
              • ऋ+ आ= र् पितृ+ आज्ञा= पित्राज्ञा
              • लृ+ आ= ल् लृ+ आकृति= लाकृति
          5. अयादि संधि
            • जब ए,  ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आता है तो ए का अय, ऐ का आय और औ का आव् हो जाता है ।
            • उदाहरण
              • ए+ अ= अय् ने+ अयन= नयन
              • ऐ+ अ= आय् नै+ अक= नायक
              • ओ+ अ= अव् पो+ अन= पवन
              • औ+ अ= आव् पौ+ अक= पावक




          2. व्यंजन संधि
          व्यंजन का व्यंजन से अथवा किसी स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। व्यंजन संधि के कुछ नियम हैं जो इस प्रकार हैं-
          1. अगर क्, च्, ट्, त्, प् के आगे कोई स्वर या किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ग अथवा य्, र्, ल्, व् आए तो क्, च्, ट्, प् के स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा अक्षर हो जाता है । क् के स्थान पर ग्, च् के स्थान पर ज्, ट् के स्थान पर ड्, त् के स्थान पर द् औरप् के स्थान पर ब् हो जाता है । 
            • दिक्+ गज= दिग्गज 
            • वाक्+ ईश= वागीश 
            • अच्+ अंत= अजंत 
            • षट्+ आनन= षडानन 
            • अप्+ ज= अब्ज 
          2. यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मेल न् या म् वर्ण से हो तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण हो जाता है। 
            • वाक्+ मय= वाङमय 
            • अच्+ नाश= अञ्नाश 
            • षट्+ मास= षण्मास 
            • उत्+ नयन= उन्नयन 
            • अप्+ मय= अम्मय 
          3. त् का मेल ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व या किसी स्वर से हो जाए तो द् हो जाता है। 
            • भगवत्+ भ,क्ति= भगवद्भक्ति 
            • तत्+ रूप= तद्रूप 
            • सत्+ धर्म= सद्धर्म 
            • जगत्+ ईश= जगदीश 
            • सत्+ भावना= सद्भावना 
          4. यदि किसी स्वर के बाद छ वर्ण आए तो छ से पहले च् वर्ण जुड़ जाता है । 
            • स्व+ छंद= स्वच्छंद 
            • संधि+ छेद= संधिविच्छेद 
            • अनु+ छेद= अनुच्छेद 
            • परि+ छेद= परिच्छेद 
          5. त् के बाद ह व्यंजन आए तो त् का द् तथा ह का ध हो जाता है । 
            • उत्+ हार= उद्धार 
            • उत्+ हरण= उद्धरण 
            • पद्+ हित= पद्धित 
          6. अगर त् के बाद श आए तो त् का च् तथा श का छ हो जाता है । 
            • उत्+ श्वास= उच्छवास 
            • तत्+ शिव= तच्छिव 
            • सत्+ शास्त्र= सच्छास्त्र 
            • उत्त्+ शिष्ट= उच्छिष्ट 
          7. त् व्यंजन के बाद च/छ हों तो च् ; ज/झ हो तो ज् ; ट/ठ हो तो ट्; ड/ढ होने पर ड् ;और ल् होने पर ल् हो जाता है। 
            • उत्+ लास= उल्लास 
            • उत्+ चारण= उच्चारण 
            • सत्+ चरित्र= सच्चरित्र 
            • उत्+ ज्वल= उज्जवल 
            • उत्+ लेख= उल्लेख 
            • शरत्+ चंद्र= शरच्चंद्र 
          8. म के बाद जिस वर्ग का व्यंजन आता है, अनुस्वार उसी के वर्ग का बन जाता है । 
            • अहम्+ कार= अहंकार 
            • सम्+ भव= संभव 
            • किम्+ तु= किंतु 
            • सम्+ बंध= संबंध 
            • किम्+ चित= किंचिंत 
          9. अगर म् के बाद म आए तो म का द्वित्व हो जाता है । 
            • सम्+ मति= सम्मति 
            • सम्+ मान= सम्मान 
          10. म् के बाद य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्, ह् में से कोई व्यंजन होने पर म् का अनुस्वार हो जाता है। 
            • सम्+ योग= संयोग 
            • सम्+ रक्षण= संरक्षण 
            • सम्+ विधान= संविधान 
            • सम्+ वाद= संवाद 
            • सम्+ शय= संशय 
            • सम्+ लग्न= संलग्न 
            • सम्+ सार= संसार 
          11. ऋ,र्, ष् के बाद न् व्यंजन आता है तो उसका ण् हो जाता है। भले ही बीच में क-वर्ग, प-वर्ग, अनुस्वार, य, र, ह आदि में से कोई भी वर्ण क्यों न आ जाए । 
            • परि+ नाम= परिणाम 
            • प्र+ मान= प्रमाण 
            • ऋ+ न= ऋण 
            • विष्+ नु= विष्णु 
            • पूर्+ न= पूर्ण 
          12. स व्यंजन से पहले अ, आ से भिन्न कोई स्वर आ जाता है तो स का परिवर्तन ष में हो जाता है । 
            • अभि+ सेक= अभिषेक 
            • नि+ सिद्ध= निषिद्ध 
            • वि+ सम= विषम 

          3. विसर्ग-संधि

          विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है उसे विसर्ग-संधि कहते हैं।
          जैसे- मनः+ अनुकूल= मनोनुकूल
          विसर्ग संधि के कुछ नियम हैं जो इस प्रकार हैं-
          1. अगर विसर्ग के पहले अ स्वर और आगे अ अथवा कोई सघोष व्यंजन (किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण) अथवा य, र,ल, व, ह में से कोई वर्ण हो तो अ और विसर्ग(:) के बदले ओ हो जाता है । 
            • मनः + बल= मनोबल 
            • मनः+ अनुकूल= मनोनुकूल 
            • अधः+ गति= अधोगति 
          2. विसर्ग से पहले अ, आ से भिन्न स्वर आए और विसर्ग के बाद किसी स्वर, किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण या य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का र में परिवर्तन हो जाता है । 
            • दु:+ उपयोग= दुरुपयोग 
            • नि:+ आहार= निराहार 
            • निः+ आशा= निराशा 
            • निः+ धन= निर्धन 
          3. विसर्ग से पहले कोई स्वर हो और बाद में च, छ या श हो तो विसर्ग का श हो जाता है । 
            • निः+ चल= निश्चल 
            • निः+ छल= निश्छल 
            • दुः+ शासन= दुश्शासन 
          4. विसर्ग के बाद यदि त या स हो तो विसर्ग स् बन जाता है । 
            • नमः+ ते= नमस्ते 
            • निः+ संतान= निस्संतान 
            • दुः+ साहस= दुस्साहस 
          5. विसर्ग से पहले इ, उ और बाद में क, ख, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ष हो जाता है। जैसे- 
            • निः+ फल= निष्फल 
            • निः+ कलंक= निष्कलंक 
            • चतुः+ पाद= चतुष्पाद 
          6. विसर्ग से पहले अ, आ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है । 
            • निः+ रस= नीरस 
            • निः+ रोग= निरोग 
          7. विसर्ग के बाद क, ख अथवा प, फ होने पर विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता। 
            • अंतः+ करण= अंतःकरण

          Thursday, 14 December 2017

          उपसर्ग

          उपसर्ग  वे शब्दांश या अव्यय होते हैं ,जो किसी शब्द के आरंभ में लगते हैं और उनके विशेष अर्थ को प्रकट करते हैं।
          जैसे- स्वदेश, प्रयोग  स्वदेश में स्व उपसर्ग है और प्रयोग में प्र उपसर्ग है ।

          उपसर्ग की संख्या

          1. संस्कृत उपसर्ग : 19 
            1. अति 
              • अर्थ :आधिक्य, मुख्य, अधिक, ऊपर, उस पार 
              • शब्दरूप : अतिशय, अतिरेक, अधिपति, अध्यक्ष, अधिकार अतिरिक्त अतिशय अत्यंत अत्याचार प्रतियोगिता अतिक्रमण
            2. अधि 
              • अर्थ :श्रेष्ठ, ऊपर, सामीप्य
              • शब्दरूप : अध्ययन, अध्यापन, अधिकरण अधिकार अधिकार अध्यात्म अध्यक्ष अधिपति
            3. अनु  
              • अर्थ :क्रम, समानता, पश्चात  
              • शब्दरूप : अनुक्रम, अनुताप, अनुज,अनुकरण, अनुमोदन, अनुशासन अनुवाद अनुसार  अनुक्रम  अनुरूप अनुकूल अनुशीलन अनुवाद 
            4. अप  
              • अर्थ :लघुता हीनता अभाव विरुद्ध 
              • शब्दरूप : अपकर्ष, अपमान,अपकार, अपजय, अपमान अपशब्द अपहरण अपराध उपकार अपभ्रंश अपकीर्ति अभ्यास अपवाद अपकर्ष 
            5. अभि  
              • अर्थ :सामीप्य आदित्य और इच्छा प्रकट करना 
              • शब्दरूप : अभिनंदन, अभिलाप, अभिमुख, अभिनय, अभ्युत्थान, अभ्युदय, अभिभावक अभियान अभिशाप अभिप्राय अभियोग अभिसार अभिमान अभिनव अभिमुख अभ्यास अभिलाषा 
            6. अव (खालीं) 
              • अर्थ :हीनता अनादर पतन
              • शब्दरूप : अवगणना, अवतरण ,अवकृपा, अवगुण, अवगत, अवलोकन, अवश्य, अवनत, अवस्था, अवसान, अवज्ञा, अवरोहण, अवतार, अवशेष, अवनति 
            7. आ  
              • अर्थ :सीमा, और, समेत, कमी, विपरीत 
              • शब्दरूप :  आकंठ, आजन्म, आरक्त, आगमन, आदान,आक्रमण, आकलन, आगमन आकाश आकर्षण आजम आरंभ आक्रमण आदान आचरण आजीवन आरोहण आमुख आमरण आक्रोश
            8. उत्  
              • अर्थ :ऊपर उत्कर्ष
              • शब्दरूप : उत्कर्ष, उत्तीर्ण, उद्भिज्ज, उत्तम उत्कंठा उत्कर्ष उत्पन्न उन्नति उद्देश्य उद्गम उद्धव 
            9. उप  
              • अर्थ :निकटता सदृश गॉड सहायक हीनता
              • शब्दरूप : उपाध्यक्ष, उपदिशा, उपग्रह, उपवेद, उपनेत्र, उपकार उपकुल उपनिवेश उपदेश उपस्थित उपमंत्री उपवन उपनाम उपासना उपभेद 
            10. दुर्- दुस्  
              • अर्थ :बुरा, कठिन, दुष्ट,  हिन
              • शब्दरूप : दुराशा, दुरुक्ति, दुश्चिन्ह, दुष्कृत्य, दुर्व्यवस्था दुर्दशा दुर्लभ चौरचन दुर्दमनीय दुराचार दो साथ दुष्कर्म दुसाध्य दुष्प्राप्य, दुर्गुण, दुर्गम 
            11. नि 
              • अर्थ :भीतर नीचे अतिरिक्त
              • शब्दरूप : निमग्न, निबंध, निकामी, निजोर, निदर्शन निकृष्ट निपात नियुक्त निवास निरूपण निगमन निवारण निषेध निरोध निदान निबंध 
            12. निर् - निस् 
              • अर्थ :अभाव, बाहर निषेध रहित
              • शब्दरूप :  निरंजन, निराषा, निष्फळ, निश्चल, नि:शेष, निर्वाह निराकरण निर्भय निरपराध निर्वाह निर्दोष निश्चल निर्जीव निरोप निर्मल
            13. परा 
              • अर्थ :उल्टा अनादर नाश 
              • शब्दरूप :  पराजय, पराभव, पराक्रम पराभव पराश्रम पराभूत 
            14. परि 
              • अर्थ :पूर्ण , व्याप्त, आसपास, चारों ओर
              • शब्दरूप : परिपाक, परिपूर्ण , परिमित, परिश्रम, परिवार, परिक्रमा परिजन परिणाम परिधि परिपूर्ण परिवर्तन परिणाम पर्याप्त परिशीलन परिवार परिदर्शन परिचय 
            15. प्र  
              • अर्थ :अधिक आगे उपन्यास
              • शब्दरूप : (आधिक्य) प्रकोप, प्रबल, प्रपिता, प्रकाश प्रख्यात प्रचार प्रबल प्रभु प्रयोग प्रगति प्रसार प्रयास प्रस्थान प्रलय प्रमाण प्रसन्ना प्रसिद्ध प्रताप प्रपंच
            16. प्रति 
              • अर्थ :उलट , एकेक, विरोध बराबरी प्रत्येक
              • शब्दरूप : प्रतिकूल, प्रतिच्छाया, प्रतिदिन, प्रतिवर्ष, प्रत्येक, परिवर्तन प्रतिक्षण प्रतिध्वनी प्रतिनिधि प्रतिकार प्रत्येक प्रतिदिन प्रतिकूल प्रतिवादी प्रत्यक्ष प्रत्युपकार
            17. वि  
              • अर्थ : अभाव , भिन्नता, हीनता, असमानता, विशेषता 
              • शब्दरूप : विख्यात, विनंती, विवाद, विफल, विधवा, विसंगति, विकास विज्ञान विदेश विधवा-विवाह विशेष विस्मरण विराम वियोग विभाग विकार विमुख विनय विभिन्न विनाश
            18. सम् 
              • अर्थ :पूर्णता सहयोग
              • शब्दरूप : संस्कृत, संस्कार, संगीत, संयम, संयोग, संकीर्ण, संकल्प संग्रह संतोष सन्यास संयोग संस्कार संरक्षण संहार सम्मेलन संस्कृत सम्मुख संग्राम संसर्ग
            19. सु 
              • अर्थ :  सुखी अच्छा भाव सहज सुंदर
              • शब्दरूप : सुभाषित, सुकृत, सुग्रास, सुगम, सुकर, स्वल्प, सुबोधित, सुशिक्षित, सुकर्म सुप्रीत सुगम सोलापुर सुंदर सुदुर स्वागत सुयश सुभाषित सुभाष सूजन
          2. हिंदी उपसर्ग : 10 
            1. अ - अन 
              • अर्थ : निषेध के अर्थ मैं 
              • शब्दरूप : 
            2. अध 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            3. उन 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            4. औ (अव )
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            5. दु 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            6. नि 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            7. बिन 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            8. भर 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            9. कु -क 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
            10. सु -स 
              • अर्थ :
              • शब्दरूप : 
          3. उर्दू उपसर्ग : 12 
            1. अल 
              • अर्थ : निश्चित 
              • शब्दरूप : अलबत्ता, अलगजर 
            2. कम 
              • अर्थ : हीन, थोड़ा
              • शब्दरूप : कमउम्र, कमखयाल, कमसिन  
            3. खुश
              • अर्थ : श्रेष्ठता के अर्थ में 
              • शब्दरूप : खुशबू, खुशदिल, खुशकिस्मत , खुशहाल, खुशखबरी,   
            4. गैर 
              • अर्थ : निषेध  
              • शब्दरूप : गैरहाजरी, गैरवाजिब, गैरकानूनी, गैरसरकारी, 
            5. दर 
              • अर्थ : में 
              • शब्दरूप : दरकार, दरमियान  
            6. ना 
              • अर्थ : अभाव 
              • शब्दरूप : नापसन्द, नामुमकिन, नाराज, नालायक, नादान 
            7. बद 
              • अर्थ : बुरा 
              • शब्दरूप : बदमाश, बदनाम, बदबू , बदहजमी, बदकार, बदकिस्मत    
            8. बर 
              • अर्थ : ऊपर,पर, बाहर 
              • शब्दरूप : बरखास्त, बरदाश्त, बरवक्त   
            9. बिल 
              • अर्थ : साथ 
              • शब्दरूप : बिलकुल 
            10. बे 
              • अर्थ : बिना 
              • शब्दरूप : बेईमान, बेवकूफ, बेरहम, बेतरह, बेइज्जत 
            11. ला
              • अर्थ : बिना 
              • शब्दरूप : लाचार, लाजवाब, लावारिस, लापरवाह, लाफत  
            12. हम 
              • अर्थ : बराबर, समान  
              • शब्दरूप : हमउम्र, हमदर्दी, हमपेशा  

          Wednesday, 13 December 2017

          काल

          क्रिया के जिस समय या काल रूप से उसके होने का बोध होता है उसे काल कहते हैं ।

          काल के तीन भेद हैं-

          1. भूत काल
            1. सामान्य भूत
            2. आसन्न भूत
            3. अपूर्ण भूत
            4. पूर्ण भूत
            5. संदिग्ध भूत  और
            6. हेतुहेतुमद भूत
          2. वर्तमान काल
            1. सामान्य वर्तमान
            2. अपूर्ण वर्तमान
            3. संदिग्ध वर्तमान
          3. भविष्य काल
            1. सामान्य भविष्यत
            2. संभाव्य भविष्यत



          शब्द रचना

          ध्वनियों के मेल से बने सार्थक वर्णसमूदाय को शब्द कहते हैं।

          व्युत्पत्ति की दृष्टि भेद
          1. तत्सम शब्द  : किसी भाषा के मूल शब्द को तत्सम कहते हैं 
          2. तद्भव शब्द  : ऐसे शब्द जो संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिंदी में आएे हैं उन्हे तद्भव शब्द कहते हैं 
          3. देशज शब्द : देशज वे शब्द होते हैं जिनकी व्युत्पत्ति का पता नहीं चलता। ये देश में बोलचाल से बने होते हैं, इसलिए इन्हे देशज कहा जाता है। 
          4. विदेशी शब्द : विदेशी भाषाओ से हिंदी में आये शब्दों को विदेशी शब्द कहते हैं। 
            1. फारसी :अफसोस, आबदार, आबरू, आतिशबाजी, अदा, आराम, आमदनी, आवारा, आफत, आवाज, आईना, उम्मीद, कद्द, कबूतर, कमीना, कुश्ती, कुश्ता, किशमिश, कमरबन्द, किनारा, कूचा, खाल, खुद, खामोश, खरगोश, खुश, खुराक, खूब, गर्द, गज, गुम, गल्ला, गोला, गवाह, गिरफ्तार, गरम, गिरह, गुलूबंद, गुलाब,  गुल,  गोश्त,चाबुक, चादर, चिराग, चश्मा, चरखा, चूँकि,  चेहरा, चाशनी, जंग, जहर, जीन, जोर, जबर, जिंदगी, जादू, जागिर, जान, जुर्माना, जिगर, जोश, तरकश, तमाशा, तेज, तीर, ताक, तबाह, तनख्वाह, ताजा, दीवार, देहात, दस्तूर, दुकान, दरबार, दंगल, दिलेर, दिल, दवा, नामर्द, नाव, नापसंद, पलंग, पैदावार, पलक, पुल, पारा, पेशा, पैमाना, बेवा, बहरा, बेहूदा, बीमार, बेरहम, मादा, माशा, मलाई, मुर्दा, मजा, मलीदा, मुफ्त, मोर्चा, मीना, मुर्गा, मरहम, याद, यार, रंग, रोगन, राह, लश्कर, लगाम, लेकिन, वर्ना, वापिस, शादी, शोर, सितारा, सितार, सरासर, सुर्ख, सरदार, सरकार, सूद, सौदागर, हफ्ता, हजारा, आदि।
            2. अरबी: अदा, अजब, अमीर, अजीब, अजायब, अदावत, अक्ल, अहमक, अल्ला, आसार, आखिर, आदमी, आदत, इनाम, इजलास, इज्जत, इमारत, इस्तीफा, इलाज, ईमान, उम्र,एहसान, औरत, औसत, औलाद, कसूर, कदम, कसर, कब्र, कमाल, कर्ज, किस्त,किस्मत, किस्सा, किला, कसम, कत्ल, कलम, कानून, कीमत, कसरत, कुर्सी, किताब, कायदा, कातिल, खबर, खत्म, खत, खिदमत, खराब, खयाल, गरीब, गैर, जाहिल, जिस्म, जलसा,  जनाब, जवाब, जहाज, जालिम, जिक्र, जिहन, तमाम, तकाजा, तकदीर, तारीख, तकिया, तमाशा, तरफ, तै, तादाद, तरक्की, तजुरबा, दाखिल, दिमाग, दवा, दाबा, दावत, दफ्तर, दगा, दुआ, दफा, दल्लाल, दुकान, दिक, दुनिया, दौलत, दान, दीन, नतीजा, नशा, नाल, नकद, नकल, नहर, फकीर, फायदा, फैसला, बाज, बहस, बाकी, मुहावरा, मदद, मुद्दई, मरजी, माल, मिसाल,मजबूर, मुंसिफ, मालूम, मामूली, मुकदमा,मुल्क,मल्लाह, मवाद, मौसम, मौका, मौलवी, मुसाफिर, महशुस, मशहूर, मजमून, मतलब, मानी, मात, यतीम, राय, लिहाज, लफ्ज, लहजा, लिफाफा, लियाकत, लायक, वारिस, वहम, वकील, शराब, हिम्मत, हैजा, हिसाब, हरामी, हद, हज्जाम, हक, हुक्म, हाजिर, हाल, हाशिया, हाकिम, हमला, हवालात, हौसला, रिश्वत औरत, कैदी, मालिक, गरीब आदि।
            3. तुर्की: आगा, आका, उजबक, उर्दू, कालीन, काबू, कज्जाक, कुली, कुर्की, कैंची, चिक, चेचक, चमचा, चुगुल, चकमक, चाकू, जाजिम, तमगा, तलाश, तोप, बेगम, बहादुर, बारूद, मुगल, लफंगा, लाश, सौगात, सुराग, दारोगा आदि।
            4. पुर्तगाली: अचार, आलपीन, अनन्नास, अलकतरा, अलमारी, बाल्टी, किरानी, कारतूस, गमला, चाबी, तिजोरी, तौलिया, फीता, साबुन, तंबाकू, कॉफी, कमीज , गोभी, नीलाम, परात, पादरी, पिस्तौल, फार्म, मेज, बुताम, मस्तूल, लबादा, साया, सागु, आया, इस्पात, इस्तिरी, कनस्टर, कमरा, काजू, क्रिस्तान, गमला, गोदाम आदि।
            5. अंग्रेजी: कॉलेज, पैंसिल, रेडियो, टेलीविजन, डॉक्टर, लैटरबक्स, पैन, टिकट, मशीन, सिगरेट, साइकिल, बोतल आदि
            6. फ्रांसीसी: पुलिस, कार्टून, इंजीनियर, कर्फ्यू, बिगुल आदि।
            7. चीनी: तूफान, लीची, चाय, पटाखा आदि।
            8. यूनानी: टेलीफोन, टेलीग्राफ, ऐटम, डेल्टा आदि।
            9. जापानी: रिक्शा आदि।
            10. डच: बम आदि।
          अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद

          1. सार्थक शब्द : जिन शब्दों का कुछ-न-कुछ अर्थ हो वे शब्द सार्थक शब्द कहलाते हैं। जैसे-रोटी, पानी, ममता, डंडा आदि।
          2. निरर्थक शब्द : जिन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता है वे शब्द निरर्थक कहलाते हैं। जैसे-रोटी-वोटी, पानी-वानी, डंडा-वंडा इनमें वोटी, वानी, वंडा आदि निरर्थक शब्द हैं। निरर्थक शब्दों पर व्याकरण में कोई विचार नहीं किया जाता है।
          बनावट के आधार पर शब्द-भेद
          1. रूढ़ शब्द: रूढ़ शब्द वह होते हैं जो परंपरा से एक विशेष अर्थ में चले आ रहे हैं और इनका शब्दांश या शब्द खंड निरर्थक होते हैं । जैसे- हवा, बकरी, नीम इत्यादि ।
          2. यौगिक शब्द : यौगिक शब्द वह होते हैं जो दो या दो अधिक शब्द खंडो से बने होते हैं । जैसे- विद्यालय, रमेश, प्रधानाचार्य इत्यादि ।
            1. प्रत्यय लगाकर
              1. कृत प्रत्यय: वह शब्दांश जो क्रियाओं (धातुओं) के अंत में लगकर नए शब्द की रचना करते हैं कृत प्रत्यय कहलाते हैं । कृत प्रत्यय के योग से बने शब्दों को (कृत+अंत) कृदंत कहते हैं।  जैसे- वच् + अन् = वचन, घट+ अना= घटना, लिख+आवट= लिखावट आदि।
              2. तद्धित प्रत्यय: जो प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम अथवा विशेषण के अंत में लगकर नए शब्द बनाते हैं तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे- आध्यात्म+ इक= आध्यात्मिक , पशु+ त्व= पशुत्व आदि।
            2. उपसर्ग लगाकर: वे शब्दांश या अव्यय जो किसी शब्द के आरंभ में लगते हैं और उनके विशेष अर्थ को प्रकट करते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं । जैसे- स्वदेश, प्रयोग इत्यादि । स्वदेश में स्व उपसर्ग है । प्रयोग में प्र उपसर्ग है ।
              1. संस्कृत उपसर्ग : 19 
              2. हिंदी उपसर्ग : 10 
              3. उर्दू उपसर्ग : 12 (अल, कम, खुश,गैर, दर, ना, बद, बर, बिल, बे, ला,हम )
            3. संधि द्वारा
            4. समास द्वारा
          3. योगरुढ शब्द : योगरुढ ऐसे यौगिक शब्द जो शब्द खंड के अलावे भी दूसरे अर्थ देते हैं । लेकिन इन शब्दों का इस्तेमाल विशेष अर्थ में किया जाता है । जैसे- लंबोदर यानी लंबे उदर वाला । इस प्रकार से जिसका पेट लंबा हुआ वो सब लंबोदर हुए । लेकिन लंबोदर गणेशजी के लिए प्रयोग किया जाता है 
          विकार की दृष्टि से शब्द-भेद

          1. विकारी शब्द : जिन शब्दों का रूप-परिवर्तन होता रहता है वे विकारी शब्द कहलाते हैं। जैसे-कुत्ता, कुत्ते, कुत्तों, मैं मुझे, हमें अच्छा, अच्छे खाता है, खाती है, खाते हैं। इनमें संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया विकारी शब्द हैं।
          2. अविकारी शब्द : जिन शब्दों के रूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता है वे अविकारी शब्द कहलाते हैं। जैसे-यहाँ, किन्तु, नित्य और, हे अरे आदि। इनमें क्रिया-विशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक आदि हैं।

          Thursday, 26 October 2017

          विशेषण

          जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताएं उसे विशेषण कहते हैं | जिस की विशेषता बताई जाए वह विशेष्य कहलाता है |

          जैसे- कौआ काला होता है ।
          इस वाक्य में काला विशेषण है क्योंकि इससे कौआ यानी संज्ञा के बारे में विशिष्ट (रंग) जानकारी मिलती है 

          विशेषण के भेद : गुणसंख्या और परिणाम के आधार पर विशेषण के निम्न भेद हैं


          1. सार्वनामिक विशेषण 
            1. मौलिक विशेषण 
            2. यौगिक सर्वनाम एक 
          2. गुणवाचक विशेषण 
          3. संख्यावाचक विशेषण
            1. अनिश्चित संख्यावाचक 
            2. परिणाम बोधक विशेषण
            3. निश्चित संख्यावाचक 
              1. गणना वाचक 
                1. पूर्णांक बोधक 
                2. अपूर्णांक बोधक 
              2. क्रमवाचक 
              3. आवृत्ति वाचक 
              4. समुदायवाचक 
              5. प्रत्येक बोधक 

          विशेषणों की रचना


          1. संज्ञा से विशेषण बनाना
            • अंश --> आंशिक 
            • धर्म --> धार्मिक
            • अलंकार --> आलंकारिक
            • नीति --> नैतिक
            • अर्थ --> आर्थिक
            • कुल --> कुलीन 
            • ग्राम --> ग्रामीण
          2. सर्वनाम से विशेषण बनाना
            • वह -->वैसा 
            • यह --> ऐसा
          3. क्रिया से विशेषण बनाना
            • पत -->पतित
            • पूज--> पूजनीय
            • भागना -->भागने वाला 
            • वंद --> वंदनीय


          सर्वनाम

          संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाने वाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं | जैसे- मैं, तो ,वह ,यह इत्यादि

          सर्वनाम के भेद: प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के छह भेद हैं जो इस प्रकार हैं

          1. पुरुषवाचक सर्वनाम 
          2. निजी वाचक सर्वनाम 
          3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम 
          4. निश्चयवाचक सर्वनाम 
          5. संबंधवाचक सर्वनाम 
          6. प्रश्नवाचक सर्वनाम 


          पुरुषवाचक सर्वनाम: पुरुषवाचक सर्वनाम स्त्री या पुरुष के नाम के बदले आता है| पुरुषवाचक सर्वनाम में पुरुष को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

          1. उत्तम पुरुष 
          2. मध्यम पुरुष 
          3. अन्य पुरुष 

          जैसे- उत्तम पुरुष मैं, हम
          मध्यम पुरुष तू, तुम, आप
          अन्य पुरुष वह, वे, यह, ये

          निजीवाचक सर्वनाम: निजी वाचक सर्वनाम का रूप आप है |लेकिन पुरुषवाचक के अन्य पुरुष से इसका प्रयोग बिल्कुल अलग है| यह करता का बोधक है एवं स्वयं करता का काम नहीं करता |
          जैसे -मैं आप वहीं से आए हैं, आप भला तो जग भला

          निश्चयवाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से वक्ता के पास या दूर की किसी वस्तु के निश्चय का बोध होता है उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं |
          जैसे- यह अफवाह ,यह घर कोई नया नहीं है, रोटी मत खाओ क्योंकि वह जली हुई है

          अनिश्चयवाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से किसी निश्चित वस्तु का बोध नहीं होता है उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं|
          जैसे- कोई, कुछ,
          उदाहरण- जल्दी खाना खाओ नहीं तो कोई आ जाएगा

          संबंधवाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से वाक्य में किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध स्थापित किया जाए उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं |
          जैसे- जो, शो
          उदाहरण- वह कौन है जो रो रहा है

          प्रश्नवाचक सर्वनाम: प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग होता है उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं |
          जैसे -कौन, क्या
          उदाहरण -कौन आता है तुम क्या कर रहे हो

          कारक

          संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका संबंध सूचित हो उसे कारक कहते हैं| कारक वाक्य में संज्ञा, सर्वनाम का क्रिया से संबंधित सूचित करता है |


           कारक के भेद: कारक आठ प्रकार के होते हैं

          1. कर्ता                                          ने 
          2. कर्म                                          को 
          3. करण                                        से 
          4. संप्रदान                                     के लिए, को 
          5. अपादान                                    से 
          6. संबंध                                        का, के, की, रा, रे, री 
          7. अधिकरण                                 में पर 
          8. संबोधन                                     हे, अजी, अरे, अहो 


          कर्ता कारक: वाक्य में जो शब्द काम करने वाले के अर्थ में आता है, उसे कर्ता कारक कहते हैं|
          जैसे- राम ने रोटी खाई

          कर्म कारक: वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं| इसके विभक्ति को है
          जैसे-मां ने बच्चों को पढ़ाया

          करण कारक: वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के संबंध का बोध हो ,उसे करण कारक कहते हैं |
          जैसे-वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है

          संप्रदान कारक: जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसको कुछ दिया जाए ,उनका बोध करने वाले शब्द के रूप को संप्रदान कारक कहते हैं|
          जैसे - अभिज्ञान प्रज्ञान को रुपए देता है

          अपादान कारक: संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट हो, उसे अपादान कारक कहते हैं|
          जैसे- हिमालय से गंगा निकलती है , अभिज्ञान घर से बाहर गया है|

          संबंध कारक: संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप से किसी अन्य शब्द के साथ संबंध या लगाव प्रतीत हो, उसे संबंध कारक कहते हैं
          जैसे-राम की किताब, प्रज्ञान का घर

          अधिकरण कारक: क्रिया या आधार को सूचित करने वाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरण कारक कहते हैं| जैसे- वह द्वार-द्वार भीख मांगता चलता है|

          संबोधन कारक: संज्ञा के जिस रुप से किसी को पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते हैं| जैसे- हे- भगवान मुझे शक्ति दे, मुझे भक्ति दे ,अरे- पागल क्या कर रहा है |

          वचन

          संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रुप से संख्या का बोध हो उसे वचन कहते हैं | शब्दों के संख्या बोधक विकारी रूप को वचन कहते हैं|

          हिंदी में वचन दो प्रकार के होते हैं

          1. एक वचन: एकवचन विकारी शब्द से यदि एक पदार्थ या व्यक्ति का बोध होता है उसे एकवचन कहते हैं जैसे -नदी, लड़का, घोड़ा, बच्चा
          2. बहुवचन: विकारी शब्द के जिस रुप से अधिक पदार्थों अथवा व्यक्तियों का बोध होता है उसे बहुवचन कहते हैं जैसे -नदियां, लड़के, घोड़े, बच्चे इत्यादि

          लिंग

          शब्दों की जाती को लिंग कहते हैं | संज्ञा के जिस रुप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का बोध हो उसे व्याकरण में लिंग कहते हैं | लिंग संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है चिन्ह या निशान

          हिंदी में लिंग दो प्रकार के होते हैं

          1. पुर्लिंग:   संज्ञा के जिस रुप से व्यक्ति या वस्तु की नर जाति का बोध हो
          2. स्त्रीलिंग : संज्ञा के जिस रुप से व्यक्ति या वस्तु की मादा जाति का बोध हो


          वाक्यों में लिंग का निर्णय निम्न प्रकार से किया जा सकता है

          • विशेषण में: मोटा सा आदमी आया है (आदमी पुर्लिंग के अनुसार), वह बड़ा मकान है (मकान पुर्लिंग के अनुसार), यह छोटी लड़की है (लड़की स्त्रीलिंग के अनुसार), यह बड़ी पुस्तक है (पुस्तक स्त्रीलिंग के अनुसार )
          • सर्वनाम में: मेरी पुस्तक अच्छी है (पुस्तक स्त्रीलिंग के अनुसार), मेरा घर बड़ा है (घर पुर्लिंग के अनुसार), उसकी कलम खो गई है (कलम स्त्रीलिंग के अनुसार), उसका स्कूल बंद है (स्कूल पुर्लिंग के अनुसार)
          • क्रिया में: बुढ़ापा गया (बुढ़ापा पुर्लिंग के अनुसार), सहायता मिली है (सहायता स्त्रीलिंग के अनुसार)
          • विभक्ति में: सामान्य गुलाब का रंग लाल है (रंगपुर रंग के अनुसार संबंध), आप का चरित्र अच्छा है (चरित्र पुर्लिंग के अनुसार)

          संज्ञा

          संज्ञा उस विकारी शब्द को कहते हैं जिससे किसी विशेष वस्तु, भाव, अथवा जीव के नाम का बोध होता है|

          संज्ञा के भेद
          संज्ञा के भेदो के संबंध में व्याकरण करता एकमत नहीं है पर अधिकतर व्याकरण कर्ता संज्ञा के 5 भेद मानते हैं| यह भेद अंग्रेजी के आधार पर हैं, कुछ रूपों के अनुरूप और कुछ प्रयोग के अनुरूप
          1. जातिवाचक संज्ञा 
          2. व्यक्तिवाचक संज्ञा 
          3. गुणवाचक संज्ञा 
          4. भाववाचक संज्ञा और 
          5. द्रव्यवाचक संज्ञा 
          व्यक्तिवाचक संज्ञा: जब शब्द से किसी एक वस्तु या व्यक्ति का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं

          जैसे:  राम, गांधीजी, गंगा 

          • व्यक्तियों के नाम: राम, रहीम, राकेश, दिनेश 
          • दिशाओं के नाम :पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण 
          • देशों के नाम: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, चीन 
          • राष्ट्रीय जातियों के नाम: भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, रूसी, अमेरिकी 
          • समुद्रों के नाम: हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, काला सागर, भूमध्य सागर 
          • नदियों के नाम: महानदी, केलो नदी, गंगा नदी, ब्रह्मापुत्र नदी, कृष्ण नदी, कावेरी नदी, सिंधु नदी 
          • पर्वत के नाम: कबरा पहाड़, हिमालय, विंध्याचल, अलकनंदा, कराकोरम 
          • नगरों चौकों और सड़कों के नाम: रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर, चांदनी चौक, अशोक नगर, चक्रधर नगर, नेहरु नगर 
          • पुस्तकों तथा समाचार पत्रों के नाम: रामचरितमानस, ऋग्वेद,आर्यवर्त 
          • ऐतिहासिक युद्धों और घटनाओं के नाम: पानीपत की पहली लड़ाई, सिपाही विद्रोह, 
          • दिनों महीनों के नाम: जून, जुलाई, अगस्त, सोमवार, मंगलवार, बुधवार 
          • त्यौहार उत्सव के नाम: होली, दीपावली, रक्षाबंधन, विजयादशमी 

          जातिवाचक संज्ञा: इन संज्ञाओं के एक ही प्रकार की वस्तुएं तथा व्यक्तियों का बोध हो उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं 
          जैसे घर, पहाड़, मनुष्य, नदी, इत्यादि 'मनुष्य' कहने से ही संसार की मनुष्य जाति का, 'घर' कहने से सभी तरह के घरों का और 'पहाड़' कहने से संसार के सभी पहाड़ों का बोध हो जाता है

          जातिवाचक संज्ञा निम्नलिखित स्थितियों की होती हैं 

          • संबंधियों, व्यवसाइयों पदों और कार्यों के नाम: बहन, मंत्री, दूल्हा, प्रोफेसर, ठग,
          • पशु पक्षियों के नाम: घोड़ा, गाय, कहा, तोता, मैना, 
          • वस्तुओं के नाम: मकान, कुर्सी, घड़ी, पुस्तक, कलम, टेबल,
          • प्राकृतिक तत्वों के नाम: तूफान, बिजली,  भूकंप, ज्वालामुखी, वर्षा 

          भाववाचक संज्ञा: जिस संज्ञा शब्द से व्यक्ति या वस्तु के गुणधर्म दशा अथवा व्यापार का बोध होता है उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं 

          जैसे लंबाई, बुढ़ापा, नमृता, मिठास, समझ, चाल, इत्यादि 

          भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण -भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण जातिवाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, सर्वनाम और अव्यय में प्रत्यय लगाकर होता है| 

          • जातिवाचक संज्ञा से:  बूढ़ा -बुढ़ापा, लड़का -लड़कपन, मित्र- मित्रता 
          • विशेषण से:  गर्म- गर्मी,  कठोर- कठोरता, मीठा -मिठास, चतुर- चतुराई 
          • क्रिया से: घबराना -घबराहट,  सजाना - सजावट, चढ़ना- चढ़ाई, मरना- मार 
          • सर्वनाम से :अपना- अपनापन, मम- ममता, ममत्व  
          • अवयव से:  दूर- दूरी , समीप- सामीप्य,  वाहवाह- वाहवाही 

          समूहवाचक संज्ञा:  जिस संज्ञा से वस्तु अथवा व्यक्ति के समूह का बोध हो उसे समूहवाचक संज्ञा कहते हैं 
          जैसे व्यक्तियों का समूह-सभा, दल, गिरोह ,
          वस्तुओं का समूह- गुच्छा, कुंज, मंडल, 

          द्रव्यवाचक संज्ञा: जिस संज्ञा से नाप तौल वाली वस्तुओं का बोध हो उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं| इस संज्ञा का सामान्यतः बहुवचन नहीं होता है| जैसे लोहा, सोना ,चांदी, दूध, पानी, तेल, तेजाब इत्यादि 


          पर्यायवाची/ समानार्थी शब्द


          जिन शब्दों के अर्थ में समानता होती है, उन्हें पर्यायवाची या समानार्थी शब्द कहते हैं |
          • अग्नि – आग, अनल, पावक.
          • अपमान – अनादर, अवज्ञा, अवहेलना, तिरस्कार.
          • अलंकार – आभूषण, गहना, जेवर.
          • अहंकार – दंभ, अभिमान, दर्प, मद, घमंड.
          • अमृत – सुधा, अमिय, पीयूष, सोम.
          • असुर – दैत्य, दानव, राक्षस, निशाचर, रजनीचर, दनुज, रात्रिचर, तमचर.
          • अतिथि – मेहमान, अभ्यागत, आगन्तुक.
          • अनुपम – अपूर्व, अतुल्य, अनोखा, अद्भुत, अनन्य.
          • अर्थ – धन, द्रव्य, मुद्रा, दौलत, वित्त, पैसा.
          • अश्व – हय, तुरंग, घोड़ा, घोटक, बाजि, सैन्धव.
          • अंधकार – तम, तिमिर, अँधेरा, तमस, अंधियारा.
          • आम – रसाल, आम्र, सौरभ, अमृतफल.
          • आग – अग्नि, अनल, हुतासन, पावक, कृशानु, वहनि, शिखी, वह्नि.
          • आँख – लोचन, नयन, नेत्र, चक्षु, दृष्टि.
          • आकाश – नभ, गगन, अम्बर, व्योम, आसमान, अर्श.
          • आनंद – हर्ष, सुख, आमोद, मोद, प्रमोद, उल्लास.
          • आश्रम – कुटी, विहार, मठ, संघ, अखाड़ा.
          • आंसू – नेत्रजल, नयनजल, चक्षुजल, अश्रु.
          • आत्मा – जीव, चैतन्य, चेतनतत्तव, अंतःकरण.
          • इच्छा – अभिलाषा, चाह, कामना, लालसा, मनोरथ, आकांक्षा, अभीष्ट.
          • इन्द्र – सुरेश, सुरेन्द्र, देवेन्द्र, सुरपति, शक्र, पुरंदर, देवराज, महेन्द्र, शचीपति.
          • इन्द्राणि – इन्द्रवधू, मधवानी, शची, शतावरी, पोलोमी.
          • ईश्वर – परमात्मा, प्रभु, ईश, जगदीश, भगवान, परमेश्वर, जगदीश्वर, विधाता.
          • उपवन – बाग़, बगीचा, उद्यान, वाटिका, गुलशन.
          • उक्ति – कथन, वचन, सूक्ति.
          • उग्र – प्रचण्ड, उत्कट, तेज, तीव्र, विकट.
          • उचित – ठीक, मुनासिब, वाज़िब, समुचित, युक्तिसंगत, न्यायसंगत, तर्कसंगत.
          • उच्छृंखल – उद्दंड, अक्खड़, आवारा, निरकुंश, मनमर्जी, स्वेच्छाचारी.
          • उज्जड़ – अशिष्ट, असभ्य, गँवार, जंगली, देहाती, उद्दंड, निरकुंश.
          • उजला – उज्ज्वल, श्वेत, सफ़ेद, धवल.
          • उजाड़ – जंगल, बियावान, वन.
          • उजाला – प्रकाश, रोशनी, चाँदनी.
          • उत्कर्ष – समृद्धि, उन्नति, प्रगति, उठान.
          • उत्कृष्ट – उत्तम, उन्नत, श्रेष्ठ, अच्छा, बढ़िया, उम्दा.
          • उत्कोच – घूस, रिश्वत.
          • उत्पत्ति – उद्गम, पैदाइश, जन्म, उद्भव, सृष्टि, आविर्भाव, उदय.
          • उद्धार – मुक्ति, छुटकारा, निस्तार.
          • उपाय – युक्ति, साधन, तरकीब, तदबीर, यत्न, प्रयत्न.
          • ऊधम – उपद्रव, उत्पात, धूम, हुल्लड़, हुड़दंग, धमाचौकड़ी.
          • ऐक्य – एकत्व, एका, एकता, मेल.
          • ऐश्वर्य – समृद्धि, विभूति.
          • ओज – तेज, शक्ति, बल, वीर्य.
          • ओंठ- ओष्ठ, अधर, होंठ.
          • औचक – अचानक, यकायक, सहसा.
          • औरत – स्त्री, जोरू, घरनी, घरवाली.
          • ऋषि – मुनि, साधु, यति, संन्यासी, तत्वज्ञ, तपस्वी.
          • कच – बाल, केश, कुन्तल, चिकुर, अलक, रोम, शिरोरूह.
          • कमल- नलिन, अरविंद, उत्पल, राजीव, पद्म, पंकज, नीरज, सरोज, जलज, जलजात, शतदल, पुण्डरीक, इन्दीवर.
          • कबूतर – कपोत, रक्तलोचन, पारावत.
          • कामदेव – मदन, मनोज, अनंग, काम, रतिपति, पुष्पधन्वा, मन्मथ.
          • कण्ठ – ग्रीवा, गर्दन, गला.
          • कृपा – प्रसाद, करुणा, दया, अनुग्रह.
          • किताब – पोथी, ग्रन्थ, पुस्तक.
          • किनारा – तीर, कूल, कगार, तट.
          • कपड़ा – चीर, वसन, पट, वस्त्र, परिधान.
          • किरण – ज्योति, प्रभा, रश्मि, दीप्ति.
          • किसान – कृषक, भूमिपुत्र, हलधर, खेतिहर, अन्नदाता.
          • कृष्ण – राधापति, घनश्याम, वासुदेव, माधव, मोहन, केशव, गोविन्द, गिरधारी.
          • कान – कर्ण, श्रुति, श्रुतिपटल, श्रवण श्रोत, श्रुतिपुट.
          • कोयल – कोकिला, पिक, काकपाली, बसंतदूत, सारिका, कुहुकिनी, वनप्रिया.
          • क्रोध – रोष, कोप, अमर्ष, कोह, प्रतिघात.
          • कीर्ति – यश, प्रसिद्धि.
          • खग – पक्षी, विहग, नभचर, अण्डज, पखेरू.
          • खंभा – स्तूप, स्तम्भ, खंभ.
          • खल – दुर्जन, दुष्ट, घूर्त, कुटिल.
          • खून – रक्त, लहू, शोणित, रुधिर.
          • गज – हाथी, हस्ती, मतंग, कूम्भा, मदकल .
          • गाय – गौ, धेनु, भद्रा.
          • गंगा – देवनदी, मंदाकिनी, भगीरथी, विश्नुपगा, देवपगा, देवनदी, जाह्नवी, त्रिपथगा.
          • गणेश – विनायक, गजानन, गौरीनंदन, गणपति, गणनायक, शंकरसुवन, लम्बोदर, एकदन्त.
          • गृह – घर, सदन, भवन, धाम, निकेतन, निवास, आलय, आवास.
          • गर्मी – ताप, ग्रीष्म, ऊष्मा, गरमी.
          • गुरु – शिक्षक, आचार्य, उपाध्याय.
          • घट – घड़ा, कलश, कुम्भ, निप.
          • घर – आलय, आवास, गृह, निकेतन, निवास, भवन, वास, वास-स्थान, शाला, सदन.
          • घृत – घी, अमृत, नवनीत.
          • घास – तृण, दूर्वा, दूब, कुश.
          • चरण – पद, पग, पाँव, पैर, पाद.
          • चतुर – विज्ञ, निपुण, नागर, पटु, कुशल, दक्ष, प्रवीण, योग्य.
          • चंद्रमा – चाँद, चन्द्र, शशि, रजनीश, निशानाथ, सोम, कलानिधि.
          • चाँदनी – चन्द्रिका, कौमुदी, ज्योत्सना, चन्द्रमरीचि, उजियारी, चन्द्रप्रभा, जुन्हाई.
          • चाँदी – रजत, सौध, रूपा, रूपक, रौप्य, चन्द्रहास.
          • चोटी – मूर्धा, सानु, शृंग.
          • छतरी – छत्र, छाता.
          • छली – छलिया, कपटी, धोखेबाज.
          • छवि – शोभा, सौंदर्य, कान्ति, प्रभा.
          • छानबीन – जाँच, पूछताछ, खोज, अन्वेषण, शोध.
          • छैला – सजीला, बाँका, शौकीन.
          • छोर – नोक, कोर, किनारा, सिरा
          • जल – सलिल, वारि, नीर, तोय, अम्बु, पानी, पय, पेय.
          • जगत – संसार, विश्व, जग, भव, दुनिया, लोक.
          • जीभ – रसज्ञा, जिह्वा, वाणी, वाचा, जबान.
          • जंगल – कानन, वन, अरण्य, गहन, कांतार, बीहड़, विटप.
          • जेवर – गहना, अलंकार, भूषण.
          • ज्योति – आभा, छवि, द्युति, दीप्ति, प्रभा.
          • झूठ – असत्य, मिथ्या.
          • तरुवर – वृक्ष, पेड़, द्रुम, तरु, पादप.
          • तलवार – असि, कृपाण, करवाल, चन्द्रहास.
          • तालाब – सरोवर, जलाशय, पुष्कर, पोखरा.
          • तीर – शर, बाण, अनी, सायक.
          • दास – सेवक, नौकर, चाकर, अनुचर, भृत्य.
          • दधि – दही, गोरस, मट्ठा.
          • दरिद्र – निर्धन, ग़रीब, रंक, कंगाल, दीन.
          • दिन – दिवस, याम, दिवा, वार.
          • दीन – ग़रीब, दरिद्र, रंक, अकिंचन, निर्धन, कंगाल.
          • दीपक – दीप, दीया, प्रदीप.
          • दुःख – पीड़ा,कष्ट, व्यथा, वेदना, संताप, शोक, खेद, पीर.
          • दूध – दुग्ध, क्षीर, पय, गौरस, स्तन्य.
          • दुष्ट – पापी, नीच, दुर्जन, अधम, खल, पामर.
          • दर्पण – शीशा, आरसी, आईना.
          • दुर्गा – चंडिका, भवानी, कल्याणी, महागौरी, कालिका, शिवा, चण्डी, चामुण्डा.
          • देवता – सुर, देव.
          • देह – काया, तन, शरीर.
          • धन – दौलत, संपत्ति, सम्पदा, वित्त.
          • धरती – धरा, धरती, वसुधा, ज़मीन, पृथ्वी, भू, भूमि, धरणी, वसुंधरा, अचला, मही, रत्नगर्भा.
          • धनुष – चाप, शरासन, कमान, कोदंड, धनु.
          • नदी – सरिता, तटिनी, सरि, सारंग, तरंगिणी, दरिया, निर्झरिणी.
          • नया – नूतन, नव, नवीन, नव्य.
          • नाव – नौका, तरणी, तरी.
          • पवन – वायु, हवा, समीर, वात, मारुत, अनिल.
          • पहाड़ – पर्वत, गिरि, अचल, शैल, भूधर, महीधर.
          • पक्षी – खेचर, दविज, पतंग, पंछी, खग, चिड़िया, गगनचर, पखेरू, विहंग, नभचर.
          • पति – स्वामी, प्राणाधार, प्राणप्रिय, प्राणेश.
          • पत्नी – भार्या, वधू, वामा, अर्धांगिनी, सहधर्मिणी, गृहणी, बहु, वनिता, दारा, जोरू, वामांगिनी.
          • पुत्र – बेटा, आत्मज, सुत, वत्स, तनुज, तनय, नंदन.
          • पुत्री – बेटी, आत्मजा, तनूजा, सुता, तनया.
          • पुष्प – फूल, सुमन, कुसुम, मंजरी, प्रसून.
          • फूल – पुष्प, सुमन, कुसुम, गुल, प्रसून.
          • बादल – मेघ, घन, जलधर, जलद, वारिद, पयोधर.
          • बालू – रेत, बालुका, सैकत.
          • बन्दर – वानर, कपि, हरि.
          • बिजली – घनप्रिया, इन्द्र्वज्र, चंचला, सौदामनी, चपला, दामिनी, तड़ित, विद्युत.
          • बगीचा – बाग़, वाटिका, उपवन, उद्यान, फुलवारी, बगिया.
          • बाण – सर, तीर, सायक, विशिख.
          • बाल – कच, केश, चिकुर, चूल.
          • ब्रह्मा – विधाता, स्वयंभू, प्रजापति, पितामह, चतुरानन, विरंचि, अज.
          • बलदेव – बलराम, बलभद्र, हलायुध, रोहिणेय.
          • बहुत – अनेक, अतीव, अति, बहुल, प्रचुर, अपरिमित, प्रभूत, अपार, अमित, अत्यन्त, असंख्य.
          • ब्राह्मण – द्विज, भूदेव, विप्र, महीदेव, भूमिसुर, भूमिदेव.
          • भय – भीति, डर, विभीषिका.
          • भाई – तात, अनुज, अग्रज, भ्राता, भ्रातृ.
          • भूषण – जेवर, गहना, आभूषण, अलंकार.
          • भौंरा – मधुप, मधुकर, द्विरेप, अलि, षट्पद, भृंग, भ्रमर.
          • मनुष्य – आदमी, नर, मानव, मानुष, मनुज.
          • मदिरा – शराब, हाला, आसव, मद.
          • मोर – कलापी, नीलकंठ, नर्तकप्रिय.
          • मधु – शहद, रसा, शहद.
          • मृग – हिरण, सारंग, कृष्णसार.
          • मछली – मीन, मत्स्य, जलजीवन, शफरी, मकर.
          • माता – जननी, माँ, अंबा, जनयत्री, अम्मा.
          • मित्र – सखा, सहचर, साथी, दोस्त.
          • यम – सूर्यपुत्र, जीवितेश, कृतांत, अन्तक, दण्डधर, कीनाश, यमराज.
          • यमुना – कालिन्दी, सूर्यसुता, रवितनया, तरणि-तनूजा, तरणिजा, अर्कजा, भानुजा.
          • युवति – युवती, सुन्दरी, श्यामा, किशोरी, तरुणी, नवयौवना.
          • रमा – इन्दिरा, हरिप्रिया, श्री, लक्ष्मी, कमला, पद्मा, पद्मासना, समुद्रजा, श्रीभार्गवी, क्षीरोदतनया.
          • रात – रात्रि, रैन, रजनी, निशा, यामिनी, निशि, यामा, विभावरी.
          • राजा – नृप, नृपति, भूपति, नरपति, भूपाल, नरेश, महीपति, अवनीपति.
          • रात्रि – निशा, रैन, रात, यामिनी, शर्वरी, तमस्विनी, विभावरी.
          • रामचन्द्र – सीतापति, राघव, रघुपति, रघुवर, रघुनाथ, रघुराज, रघुवीर,  जानकीवल्लभ, कौशल्यानन्दन.
          • रावण – दशानन, लंकेश, लंकापति, दशशीश, दशकंध.
          • राधिका – राधा, ब्रजरानी, हरिप्रिया, वृषभानुजा.
          • लड़का – बालक, शिशु, सुत, किशोर, कुमार.
          • लड़की – बालिका, कुमारी, सुता, किशोरी, बाला, कन्या.
          • लक्ष्मी – कमला, पद्मा, रमा, हरिप्रिया, श्री, इंदिरा, पद्मजा, सिन्धुसुता, कमलासना.
          • लक्ष्मण – लखन, शेषावतार, सौमित्र, रामानुज, शेष.
          • लौह – अयस, लोहा, सार.
          • लता – बल्लरी, बल्ली, बेली.
          • वायु – हवा, पवन, समीर, अनिल, वात, मारुत.
          • वसन – अम्बर, वस्त्र, परिधान, पट, चीर.
          • विधवा – अनाथा, पतिहीना.
          • विष – ज़हर, हलाहल, गरल, कालकूट.
          • वृक्ष – पेड़, पादप, विटप, तरू, गाछ, दरख्त, शाखी, विटप, द्रुम.
          • विष्णु – नारायण, चक्रपाणी.
          • विश्व – जगत, जग, भव, संसार, लोक, दुनिया.
          • विद्युत – चपला, चंचला, दामिनी, सौदामिनी, तड़ित, बीजुरी, घनवल्ली, क्षणप्रभा, करका.
          • बारिश – वर्षण, वृष्टि, वर्षा, पावस, बरसात.
          • वीर्य – जीवन, सार, तेज, शुक्र, बीज.
          • वज्र – कुलिस, पवि, अशनि, दभोलि.
          • विशाल – विराट, दीर्घ, वृहत, बड़ा, महान.
          • वृक्ष – गाछ, तरु, पेड़, द्रुम, पादप, विटप, शाखी.
          • शिव – भोलेनाथ, शम्भू, त्रिलोचन, महादेव, नीलकंठ, शंकर.
          • शरीर – देह, तनु, काया, कलेवर, अंग, गात.
          • शत्रु – रिपु, दुश्मन, अमित्र, वैरी, अरि, विपक्षी.
          • शिक्षक – गुरु, अध्यापक, आचार्य, उपाध्याय.
          • शेर – केहरि, केशरी, वनराज, सिंह.
          • शेषनाग – अहि, नाग, भुजंग, व्याल, उरग, पन्नग, फणीश, सारंग.
          • शुभ्र – गौर, श्वेत, अमल, वलक्ष, शुक्ल, अवदात.
          • शहद – पुष्परस, मधु, आसव, रस, मकरन्द.
          • षंड – हीजड़ा, नपुंसक, नामर्द.
          • षडानन – षटमुख, कार्तिकेय, षाण्मातुर.
          • सीता – वैदेही, जानकी, भूमिजा, जनकतनया, जनकनन्दिनी, रामप्रिया.
          • साँप – अहि, भुजंग, ब्याल, सर्प, नाग, विषधर, उरग, पवनासन.
          • सूर्य – रवि, सूरज, दिनकर, प्रभाकर, आदित्य, दिनेश, भास्कर, दिनकर, दिवाकर, भानु, आदित्य.
          • संसार – जग, विश्व, जगत, लोक, दुनिया.
          • सोना – स्वर्ण, कंचन, कनक, हेम, कुंदन.
          • सिंह – केसरी, शेर, मृगपति, वनराज, शार्दूल, नाहर, सारंग, मृगराज.
          • समुद्र – सागर, पयोधि, उदधि, पारावार, नदीश, जलधि, सिंधु, रत्नाकर, वारिधि.
          • सम – सर्व, समस्त, सम्पूर्ण, पूर्ण, समग्र, अखिल, निखिल.
          • समीप – सन्निकट, आसन्न, निकट, पास.
          • समूह – दल, झुंड, समुदाय, टोली, जत्था, मण्डली, वृंद, गण, पुंज, संघ, समुच्चय.
          • सभा – अधिवेशन, संगीति, परिषद, बैठक, महासभा.
          • सुन्दर – कलित, ललाम, मंजुल, रुचिर, चारु, रम्य, मनोहर, सुहावना, चित्ताकर्षक, रमणीक, कमनीय, उत्कृष्ट, उत्तम, सुरम्य.
          • सन्ध्या – सायंकाल, शाम, साँझ, प्रदोषकाल, गोधूलि.
          • स्त्री – सुन्दरी, कान्ता, कलत्र, वनिता, नारी, महिला, अबला, ललना, औरत, कामिनी, रमणी.
          • सुगंधि – सौरभ, सुरभि, महक, खुशबू.
          • स्वर्ग – सुरलोक, देवलोक, दिव्यधाम, ब्रह्मधाम, द्यौ, परमधाम, त्रिदिव, दयुलोक.
          • स्वर्ण – सुवर्ण, कंचन, हेन, हारक, जातरूप, सोना, तामरस, हिरण्य.
          • सरस्वती – गिरा, शारदा, भारती, वीणापाणि, विमला, वागीश, वागेश्वरी.
          • सहेली – आली, सखी, सहचरी, सजनी, सैरन्ध्री.
          • संसार – लोक, जग, जहान, जगत, विश्व.
          • हस्त – हाथ, कर, पाणि, बाहु, भुजा.
          • हिमालय – हिमगिरी, हिमाचल, गिरिराज, पर्वतराज, नगेश.
          • हिरण – सुरभी, कुरग, मृग, सारंग, हिरन.
          • होंठ – अक्षर, ओष्ठ, ओंठ.
          • हनुमान – पवनसुत, पवनकुमार, महावीर, रामदूत, मारुततनय, अंजनीपुत्र, आंजनेय, कपीश्वर, केशरीनंदन, बजरंगबली, मारुति.
          • हिमांशु – हिमकर, निशाकर, क्षपानाथ, चन्द्रमा, चन्द्र, निशिपति.
          • हंस – कलकंठ, मराल, सिपपक्ष, मानसौक.
          • हृदय – छाती, वक्ष, वक्षस्थल, हिय, उर.
          • हाथ – हस्त, कर, पाणि.
          • हाथी – हस्ती, कुंजर, कूम्भा, मतंग, वारण, गज, द्विप, करी, मदकल


          Saturday, 21 October 2017

          शरीर के अंगो पर हिंदी मुहावरे

          आँख पर मुहावरे

          • आँखें खुलना (होश आना, सावधान होना)- जनजागरण से हमारे शासकों की आँखें अब खुलने लगी हैं।
          • आँखें चार होना (आमने-सामने होना)- जब आँखें चार होती है, मुहब्बत हो ही जाती है।
          • आँखें मूँदना (मर जाना)- आज सबेरे उसके पिता ने आँखें मूँद ली।
          • आँखें चुराना (नजर बचाना, अपने को छिपाना)- मुझे देखते ही वह आँखें चुराने लगा।
          • आखों में खून उतरना (अधिक क्रोध करना)- बेटे के कुकर्म की बात सुनकर पिता की आँखों में खून उतर आया।
          • आँखों में गड़ना (किसी वस्तु को पाने की उत्कट लालसा)- उसकी कलम मेरी आँखों में गड़ गयी है।
          • आँखें फेर लेना (उदासीन हो जाना)- मतलब निकल जाने के बाद उसने मेरी ओर से बिलकुल आँखें फेर ली है।
          • आँख मारना (इशारा करना)- उसने आँख मारकर मुझे बुलाया।
          • आँखों में धूल झोंकना (धोखा देना)- वह बड़ों-बड़ों की आँखों में धूल झोंक सकता है।
          • आँखें बिछाना (प्रेम से स्वागत करना)- मैंने उनके लिए अपनी आँखें बिछा दीं।
          • आँखों का काँटा होना (शत्रु होना)- वह मेरी आँखों का काँटा हो रहा है।
          • आँख उठाना- (हानि पहुँचाने की दृष्टि से देखना)
          • आँखें ठंढी होना- (इच्छा पूरी होना)
          • आँख दिखाना- (क्रोध प्रकट करना)
          • आँखों पर बिठाना- (आदर करना)
          • आँख भर आना- (आँसू आना)
          • आँखों में धूल डालना- (धोखा देना)
          • आँखें लड़ना- (देखादेखी होना, प्रेम होना)
          • आँखें लाल करना- (क्रोध की नजर से देखना)
          • आँखें थकना- (प्रतीक्षा में निराश होना)
          • आँखों में चर्बी छाना- (घमण्डी होना)
          • आँखों में खटकना- (बुरा लगना)
          • आँखें नीली-पीली करना- (नाराज होना)
          • आँख का अंधा, गाँठ का पूरा- (मूर्ख धनवान)
          • आँखों की किरकिरी होना- (शत्रु होना)
          • आँखों का प्यारा या पुतली होना- (बहुत प्यारा होना)
          • आँखों का पानी ढल जाना- (लज्जारहित हो जाना)
          • आँखें सेंकना- (किसी की सुन्दरता देख आँखें जुड़ाना)
          • आँखें आना- (आँख में एक प्रकार की बीमारी होना)
          • आँखें गड़ाना- (दिल लगाना, इच्छा करना)
          • आँख फड़कना- (सगुन उचरना)
          • आँखें लगना- (प्रेम करना, जरा-सी नींद आना)
          • आँख रखना- (ध्यान रखना)
          • आँख में पानी रखना- (मुरौवत रखना)

          अँगूठा पर मुहावरे

          • अँगूठा चूमना- (खुशामद करना)
          • अँगूठा दिखाना- (देने से इंकार करना)
          • अँगूठा नचाना- (चिढाना)

          आँसू पर मुहावरे

          • आँसू पोंछना- (धीरज बँधाना)
          • आँसू बहाना- (खूब रोना)
          • आँसू पी जाना- (दुःख को छिपा लेना)

          ओठ पर मुहावरे

          • ओठ चाटना- (स्वाद की इच्छा रखना)
          • ओठ मलना- (दण्ड देना)
          • ओठ चबाना- (क्रोध करना)
          • ओठ सूखना- (प्यास लगना)

          ऊँगली पर मुहावरे

          • ऊँगली उठना- (निन्दा होना)
          • ऊँगली पकड़ते पहुँचा पकड़ना- (थोड़ा-सा सहारा पाकर अधिक के लिए उत्साहित होना)
          • कानों में ऊँगली देना- (किसी बात को सुनने की चेष्टा न करना)
          • पाँचों उँगलियाँ घी में होना- (सब प्रकार से लाभ-ही-लाभ)
          • सीधी ऊँगली से घी न निकलना- (भलमनसाहत से काम न होना)

          कान पर मुहावरे

          • कान खोलना (सावधान करना)- मैंने उसके कान खोल दिये। अब वह किसी के चक्कर में नहीं आयेगा।
          • कान खड़े होना (होशियार होना)- दुश्मनों के रंग-ढंग देखकर मेरे कान खड़े हो गये।
          • कान फूंकना (दीक्षा देना, बहकाना)- मोहन के कान सोहन ने फूंके थे, फिर उसने किसी की कुछ न सुनी।
          • कान लगाना (ध्यान देना)- उसकी बातें कान लगाने योग्य हैं।
          • कान भरना (पीठ-पीछे शिकायत करना)- तुम बराबर मेरे खिलाफ अफसर के कान भरते हो।
          • कान में तेल डालना (कुछ न सुनना)- मैं कहते-कहते थक गया, पर ये कान में तेल डाले बैठे हैं।
          • कान पर जूँ न रेंगना (ध्यान न देना, अनसुनी करना)- सरकार तो बड़ी-बड़ी बातें कहती है, मगर अफसरों के कान पर जूँ नहीं रेंगती।
          • कान देना (ध्यान देना)- शिक्षकों की बातों पर कान दीजिए।
          • कान उमेठना- (शपथ लेना)
          • कान पकड़ना- (प्रतिज्ञा करना)
          • कानों कान खबर होना- (बात फैलना)
          • कान काटना- (बढ़कर काम करना)

          कलेजा पर मुहावरे

          • कलेजे से लगाना- (प्यार करना, छाती से चिपका लेना)
          • कलेजा काँपना- (डरना)
          • कलेजा थामकर रह जाना- (अफसोस कर रह जाना)
          • कलेजा निकाल कर रख देना- (अतिप्रिय वस्तु अर्पित कर देना)
          • कलेजा ठंढा होना- (संतोष होना)

          नाक पर मुहावरे

          • नाक कट जाना (प्रतिष्ठा नष्ट होना)- पुत्र के कुकर्म से पिता की नाक कट गयी।
          • नाक काटना (बदनाम करना)- भरी सभा में उसने मेरी नाक काट ली।
          • नाक-भौं चढ़ाना (क्रोध अथवा घृणा करना)- तुम ज्यादा नाक-भौं चढ़ाओगे, तो ठीक न होगा।
          • नाक में दम करना (परेशान करना)- शहर में कुछ गुण्डों ने लोगों की नाक में दम कर रखा है।
          • नाक का बाल होना (अधिक प्यारा होना)- मैनेजर मुंशी की न सुनेगा तो किसकी सुनेगा ?वह तो आजकल उसकी नाक का बाल बना हुआ है।
          • नाक रगड़ना (दीनतापूर्वक प्रार्थना करना)- उसने मालिक के सामने बहुत नाक रगड़ी, पर सुनवाई न हुई।
          • नाकों चने चबवाना (तंग करना)- भारतीयों ने अंगरेजों को नाकों चने चबवा दिये।
          • नाक पर मक्खी न बैठने देना (निर्दोष बचे रहना)- उसने कभी नाक पर मक्खी बैठने ही न दी।
          • नाक पर गुस्सा (तुरन्त क्रोध)- गुस्सा तो उसकी नाक पर रहता है।
          • नाक रखना- (प्रतिष्ठा रखना)

          मुँह पर मुहावरे

          • मुँह छिपाना (लज्जित होना)- वह मुझसे मुँह छिपाये बैठा है।
          • मुँह पकड़ना (बोलने से रोकना)- लोकतन्त्र में कोई किसी का मुँह नहीं पकड़ सकता।
          • मुँह की खाना (बुरी तरह हारना)- अन्त में उसे मुँह की खानी पड़ी।
          • मुँह दिखाना (प्रत्यक्ष होना)- तुमने ऐसा कुकर्म किया है कि अब किसी के सामने मुँह दिखाने के लायक न रहे।
          • मुँह उतरना (उदास होना)- परीक्षा में असफल होने पर श्याम का मुँह उतर आया।
          • मुँह खुलना- (उदण्डतापूर्वक बातें करना, बोलने का साहस होना)
          • मुँह देना, या डालना- (किसी पशु का मुँह डालना)
          • मुँह बन्द होना- (चुप होना)
          • मुँह में पानी भर आना- (ललचना)
          • मुँह से लार टपकना- (बहुत लालची होना)
          • मुँह काला होना- (कलंक या दोष लगना)
          • मुँह धो रखना- (आशा न रखना)
          • मुँह पर (या चेहरे पर) हवाई उड़ना)- (घबराना)
          • मुँहफट हो जाना- (निर्लज्ज होना)
          • मुँह फुलाना- (रूठ जाना)
          • मुँह बनाना- (असंतुष्ट होना)
          • मुँह मोड़ना- (ध्यान न देना)
          • मुँह लगाना- (सिर चढ़ाना)
          • मुँह रखना- (लिहाज रखना)
          • मुँहदेखी करना- (पक्षपात करना)
          • मुँह चुराना- (संकोच करना)
          • मुँह में लगाम न होना- (जो मुँह में आवे सो कह देना)
          • मुँह चाटना- (खुशामद करना)
          • मुँह भरना- (घूस देना)
          • मुँह लटकना- (रंज होना)
          • मुँह आना- (मुँह की बीमारी होना)
          • मुँह की खाना- (परास्त होना)
          • मुँह सूखना- (भयभीत होना)
          • मुँह ताकना- (किसी का आसरा करना)
          • मुँह में खून लगना- (बुरी चाट पड़ना, चसका लगना)
          • मुँह फेरना- (अकृपा करना)
          • मुँह मीठा करना- (प्रसन्न करना)
          • मुँह से फूल झड़ना- (मधुर बोलना)
          • मुँह में घी-शक्कर- (किसी अच्छी भविष्यवाणी का अनुमोदन करना)
          • मुँह से मुँह मिलाना- (हाँ-में-हाँ मिलाना, बही-खाता आदि में हिसाब सही न लिखकर भी जमा-खर्च या उत्तर सही लिख देना )

          दाँत पर मुहावरे

          • दाँत दिखाना (खीस काढ़ना)- खुद ही देर की और अब दाँत दिखाते हो।
          • दाँत तले ऊँगली दबाना (चकित होना)- ढाके की मलमल देखकर इंगलैण्ड के जुलाहे दाँतों तले ऊँगली दबाते थे।
          • दाँत काटी रोटी (गहरी दोस्ती)- राम के पिता से श्याम के पिता की दाँत काटी रोटी है।
          • दाँत गिनना (उम्र पता लगाना)- कुछ लोग ऐसे है कि उनपर वृद्धावस्था का असर ही नहीं होता। ऐसे लोगों के दाँत गिनना आसान नहीं।
          • दाँत खट्टे करना- (पस्त करना)
          • तालू में दाँत जमना- (बुरे दिन आना)
          • दाँत जमाना- (अधिकार पाने के लिए दृढ़ता दिखाना)
          • दाँत गड़ाना- (किसी वस्तु को पाने के लिए गहरी)
          • दाँत गिनना- (उम्र बताना)

          बात पर मुहावरे

          • बात का धनी (वायदे का पक्का)- मैं जानता हूँ, वह बात का धनी है।
          • बात की बात में (अति शीघ्र)- बात की बात में वह चलता बना।
          • बात चलाना (चर्चा चलाना)- कृपया मेरी बेटी के ब्याह की बात चलाइएगा ।
          • बात तक न पूछना (निरादर करना)- मैं विवाह के अवसर पर उसके यहाँ गया, पर उसने बात तक न पूछी।
          • बात बढ़ाना (बहस छिड़ जाना)- देखो, बात बढाओगे तो ठीक न होगा।
          • बात बनाना (बहाना करना)- तुम्हें बात बनाने से फुर्सत कहाँ ?

          सिर पर मुहावरे

          • सिर उठाना (विरोध में खड़ा होना)- देखता हूँ, मेरे सामने कौन सिर उठाता है ?
          • सिर भारी होना (सिर में दर्द होना, शामत सवार होना)- मेरा सिर भारी हो रहा है। किसका सिर भारी हुआ है जो इसकी चर्चा करें ?
          • सिर पर सवार होना (पीछे पड़ना)- तुम कब तक मेरे सिर पर सवार रहोगे ?
          • सिर से पैर तक (आदि से अन्त तक)- तुम्हारी जिन्दगी सिर से पैर तक बुराइयों से भरी है।
          • सिर पीटना (शोक करना)- चोर उस बेचारे की पाई-पाई ले गये। सिर पीटकर रह गया वह।
          • सिर पर भूत सवार होना (एक ही रट लगाना, धुन सवार होना)- मालूम होता है कि घनश्याम के सिर पर भूत सवार हो गया है, जो वह जी-जान से इस काम में लगा है।
          • सिर फिर जाना (पागल हो जाना)- धन पाकर उसका सिर फिर गया है।
          • सिर चढ़ाना (शोख करना)- बच्चों को सिर चढ़ाना ठीक नहीं।
          • सिर आँखों पर होना- (सहर्ष स्वीकार होना)
          • सिर पर चढ़ना- (शेख होना)
          • सिर ऊँचा करना- (आदर का पात्र होना)
          • सिर खाना- (बकवास करना)
          • सिर झुकाना- (आत्मसमर्पण करना)
          • सिर पर पांव रखकर भागना- (बहुत जल्द भाग जाना)
          • सिर पड़ना- (नाम लगना)
          • सिर खुजलाना- (बहाना करना)
          • सिर धुनना- (शोक करना)
          • सिर चढ़कर बोलना- (छिपाये न छिपना)
          • सिर मारना- (प्रयत्न करना)
          • सिर पर खेलना- (प्राण दे देना)
          • सिर गंजा कर देना- (मारने का भय दिखाना)
          • सिर पर कफन बाँधना- (शहादत के लिए तैयार होना)

          गर्दन पर मुहावरे

          • गर्दन उठाना (प्रतिवाद करना)- सत्तारूढ़ सरकार के विरोध में गर्दन उठाना टेढ़ी खीर है।
          • गर्दन पर सवार होना (पीछा न छोड़ना)- जब देखो, तब मेरी गर्दन पर सवार रहते हो।
          • गर्दन काटना (जान से मारना, हानि पहुँचाना)- वह तो उनकी गर्दन काट डालेगा। झूठी शिकायत कर क्यों गरीब की गर्दन काटने पर तुले हो ?
          • गर्दन पर छुरी फेरना- (अत्याचार करना)

          हाथ पर मुहावरे

          • हाथ आना- (अधिकार में आना)
          • हाथ खींचना- (अलग होना)
          • हाथ खुजलाना- (किसी को पीटने को जी चाहना
          • हाथ देना- (सहायता देना)
          • हाथ पसारना- (माँगना)
          • हाथ बँटाना- (मदद करना)
          • हाथ लगाना- (आरंभ करना)
          • हाथ मलना- (पछताना)
          • हाथ गरम करना- (घूस देना)
          • हाथ चूमना- (हर्ष व्यक्त करना)
          • हाथ धोकर पीछे पड़ना- (जी-जान से लग जाना)
          • हाथ पर हाथ धरे बैठना- (बेकार बैठे रहना)
          • हाथ फैलना- (याचना करना)
          • हाथ मारना- (उड़ा लेना, लाभ उठाना)
          • हाथ साफ करना- (मारना, उड़ा लेना, खूब खाना)
          • हाथ धो बैठना- (आशा खो देना)
          • हाथापाई करना- (मुठभेड़ होना)
          • हाथ पकड़ना- किसी स्त्री को पत्नी बनाना, आश्रय देना)

          हिंदी मुहावरे

          मुहावरा ऐसे वाक्यांश होते है, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी विलक्षण अर्थ की प्रतीति कराते हैं  , मुहावरे के प्रयोग से भाषा में सरलता, सरसता, चमत्कार और प्रवाह उत्पत्र होते है
          • अँगूठा दिखाना (समय पर धोखा देना)- अपना काम तो निकाल लिया, पर जब मुझे जरूरत पड़ी, तब अँगूठा दिखा दिया। भला, यह भी कोई मित्र का लक्षण है।
          • अँचरा पसारना (माँगना, याचना करना)- हे देवी मैया, अपने बीमार बेटे के लिए आपके आगे अँचरा पसारती हूँ। उसे भला-चंगा कर दो, माँ।
          • अँधेरे मुँह- (प्रातः काल, तड़के)
          • अंक भरना (स्नेह से लिपटा लेना)- माँ ने देखते ही बेटी को अंक भर लिया।
          • अंकुश देना- (दबाव डालना)
          • अंग टूटना (थकान का दर्द)- इतना काम करना पड़ा कि आज अंग टूट रहे है।
          • अंग में अंग चुराना- (शरमाना)
          • अंग-अंग फूले न समाना- (आनंदविभोर होना)
          • अंगार बनना- (लाल होना, क्रोध करना)
          • अंगारों पर पैर रखना (अपने को खतरे में डालना, इतराना)- भारतीय सेना अंगारों पर पैर रखकर देश की रक्षा करते है।
          • अंगारों पर लेटना (डाह होना, दुःख सहना) वह उसकी तरक्की देखते ही अंगारों पर लोटने लगा। मैं जीवन भर अंगारों पर लोटता रहा हूँ।
          • अंडे का शाहजादा- (अनुभवहीन)
          • अकेला दम (अकेला)- मेरा क्या ! अकेला दम हूँ; जिधर सींग समायेगा, चल दूँगा।
          • अक्ल का अजीर्ण होना (आवश्यकता से अधिक अक्ल होना)- सोहन किसी भी विषय में दूसरे को महत्व नही देता है, उसे अक्ल का अजीर्ण हो गया है।
          • अक्ल का चरने जाना (समझ का अभाव होना)- इतना भी समझ नहीं सके ,क्या अक्ल चरने गए है ?
          • अक्ल का दुश्मन (मूर्ख)- राम तुम मेरी बात क्यों नहीं मानते, लगता है आजकल तुम अक्ल के दुश्मन हो गए हो।
          • अक्ल का पुतला (बहुत बुद्धिमान)- विदुर जी अक्ल का पुतला थे।
          • अक्ल की दुम (अपने को बड़ा होशियार लगानेवाला)- दस तक का पहाड़ा भी तो आता नहीं, मगर अक्ल की दुम साइन्स का पण्डित बनता है।
          • अक्ल के घोड़े दौड़ाना (कल्पनाएँ करना)- वह हमेशा अक्ल के घोड़े दौड़ाता रहता है।
          • अक्ल दंग होना (चकित होना)- मोहन को पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता लेकिन परीक्षा परिणाम आने पर सब का अक्ल दंग हो गया।
          • अक्ल पर पत्थर पड़ना (बुद्धि भष्ट होना)- विद्वान और वीर होकर भी रावण की अक्ल पर पत्थर ही पड़ गया था कि उसने राम की पत्नी का अपहरण किया।
          • अगले जमाने का आदमी (सीधा-सादा, ईमानदार)- आज की दुनिया ऐसी हो गई कि अगले जमाने का आदमी बुद्धू समझा जाता है।
          • अगिया बैताल- (क्रोधी)
          • अठखेलियाँ सूझना- (दिल्लगी करना)
          • अड़चन डालना- (बाधा उपस्थित करना)
          • अड़ियल टट्टू- (रूक-रूक कर काम करना)
          • अढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना- (सबसे अलग रहना)- मोहन आजकल अढ़ाई चावल की खिचड़ी अलग पकाते है।
          • अढाई दिन की हुकूमत (कुछ दिनों की शानोशौकत)- जनाब, जरा होशियारी से काम लें। यह अढाई दिन की हुकूमत जाती रहेगी।
          • अण्टी मारना (चाल चलना)- ऐसी अण्टीमारो कि बच्चू चारों खाने चित गिरें।
          • अण्ड-बण्ड कहना (भला-बुरा या अण्ट- सण्ट कहना)- क्या अण्ड-बण्ड कहे जा रहे हो। वह सुन लेगा, तो कचूमर ही निकाल छोड़ेगा।
          • अत्र लगना (स्वस्थ रहना)- उसे ससुराल का ही अत्र लगता है। इसलिए तो वह वहीं का हो गया।
          • अत्र-जल उठना (रहने का संयोग न होना, मरना)- मालूम होता है कि तुम्हारा यहाँ से अत्र-जल उठ गया है, जो सबसे बिगाड़ किये रहते हो।
          • अत्र-जल करना (जलपान, नाराजगी आदि के कारण निराहार के बाद आहार-ग्रहण)- भाई, बहुत दिनों पर आये हो। अत्र-जल तो करते जाओ।
          • अन्त पाना (भेद पाना)- उसका अन्त पाना कठिन है।
          • अन्तर के पट खोलना (विवेक से काम लेना)- हर हमेशा हमें अन्तर के पट खोलना चाहिए।
          • अन्धा बनना (आगे-पीछे कुछ न देखना)- धर्म से प्रेम करो, पर उसके पीछे अन्धा बनने से तो दुनिया नहीं चलती।
          • अन्धा बनाना (धोखा देना)- मायामृग ने रामजी तक को अन्धा बनाया था। इस माया के पीछे मौजीलाल अन्धे बने तो क्या।
          • अन्धा होना (विवेकभ्रष्ट होना)- अन्धे हो गये हो क्या, जवान बेटे के सामने यह क्या जो-सो बके जा रहे हो ?
          • अन्धाधुन्ध लुटाना (बिना विचारे व्यय)- अपनी कमाई भी कोई अन्धाधुन्ध लुटाता है ?
          • अन्धे की लकड़ी (एक ही सहारा)- भाई, अब तो यही एक बेटा बचा, जो मुझे अन्धे की लकड़ी है। इसे परदेश न जाने दूँगा।
          • अन्धेर नगरी (जहाँ धांधली का बोलबाला हो)- इकत्री का सिक्का था, तो चाय इकत्री में मिलती थी, दस पैसे का निकला, तो दस पैसे में मिलने लगी। यह बाजार नहीं, अन्धेरनगरी ही है।
          • अन्धेरखाता (अन्याय)- मुँहमाँगा दो, फिर भी चीज खराब। यह कैसा अन्धेरखाता है।
          • अन्धों में काना राजा- (अज्ञानियों में अल्पज्ञान वाले का सम्मान होना)
          • अपना उल्लू सीधा करना (मतलब निकालना)- आजकल के नेता अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही लोगों को भड़काते है।
          • अपना किया पाना (कर्म का फल भोगना)- बेहूदों को जब मुँह लगाया है, तो अपना किया पाओ। झखते क्या हो ?
          • अपना घर समझना- (बिना संकोच व्यवहार)
          • अपना-सा मुँह लेकर रह जाना (शर्मिन्दा होना)- आज मैंने ऐसी चुभती बात कही कि वे अपना-सा मुँह लिए रह गये।
          • अपनी खिचड़ी अलग पकाना (स्वार्थी होना, अलग रहना)-यदि सभी अपनी खिचड़ी अलग पकाने लगें, तो देश और समाज की उत्रति होने से रही।
          • अपनी डफली आप बजाना- (अपने मन की करना)- राधा दूसरे की बात नहीं सुनती, वह हमेशा अपनी डफली आप बजाती है।
          • अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारना (संकट मोल लेना)- उससे तकरार कर तुमने अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारी है।
          • अपने पैरों पर खड़ा होना (स्वालंबी होना)- युवकों को अपने पैरों पर खड़े होने पर ही विवाह करना चाहिए।
          • अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना (स्वयं अपनी प्रशंसा करना)- अच्छे आदमियों को अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनना शोभा नहीं देता।
          • अब-तब करना (बहाना करना)- कोई भी चीज माँगो, वह अब-तब करना शुरू कर देगा।
          • अब-तब होना (परेशान करना या मरने के करीब होना)- दवा देने से क्या ! वह तो अब-तब हो रहा है।
          • अरण्य-चन्द्रिका- (निष्प्रयोजन पदार्थ)
          • अरमान निकालना- (इच्छाएँ पूरी करना)
          • आँख का तारा - (बहुत प्यारा)- आज्ञाकारी बच्चा माँ-बाप की आँखों का तारा होता है।
          • आँख भर आना (आँसू आना)- बेटी की विदाई पर माँ की आखें भर आयी।
          • आँखे खुलना (सचेत होना)- ठोकर खाने के बाद ही बहुत से लोगों की आँखे खुलती है।
          • आँखे दिखाना (बहुत क्रोध करना)- राम से मैंने सच बातें कह दी, तो वह मुझे आँख दिखाने लगा।
          • आँखों में बसना (हृदय में समाना)- वह इतना सुंदर है की उसका रूप मेरी आखों में बस गया है।
          • आँच न आने देना (जरा भी कष्ट या दोष न आने देना)- तुम निश्र्चिन्त रहो। तुमपर आँच न आने दूँगा।
          • आकाश छूना- (बहुत ऊँचा होना)
          • आकाश से तारे तोड़ना- (कठिन कार्य करना)
          • आकाश-पाताल एक करना- (अत्यधिक उद्योग/परिश्रम करना)
          • आग उगलना- (क्रोध प्रकट करना)
          • आग का पुतला- (क्रोधी)
          • आग पर आग डालना- (जले को जलाना)
          • आग पर पानी डालना- (क्रुद्ध को शांत करना, लड़नेवालों को समझाना-बुझाना)
          • आग पानी का बैर- (सहज वैर)
          • आग बबूला होना- (अति क्रुद्ध होना)
          • आग बोना- (झगड़ा लगाना)
          • आग में कूद पड़ना- (खतरा मोल लेना)
          • आग में घी डालना- (झगड़ा बढ़ाना, क्रोध भड़काना)
          • आग रखना- (मान रखना)
          • आग लगने पर कुआँ खोदना- (पहले से करने के काम को ऐन वक़्त पर करने चलना)
          • आग लगाकर तमाशा देखना- (झगड़ा खड़ाकर उसमें आनंद लेना)
          • आग लगाकर पानी को दौड़ाना- पहले झगड़ा लगाकर फिर उसे शांत करने का यत्न करना)
          • आग से पानी होना- (क्रोध करने के बाद शांत हो जाना)
          • आटे-दाल का भाव मालूम होना- (सांसरिक कठिनाइयों का ज्ञान होना)
          • आठ-आठ आँसू रोना (बुरी तरह पछताना)- इस उमर में न पढ़ा, तो आठ-आठ आँसू न रोओ तो कहना।
          • आड़े आना- (नुकसानदेह)
          • आड़े हाथों लेना- (झिड़कना, बुरा-भला कहना)
          • आन की आन में- (फौरन ही)
          • आसन डोलना (लुब्ध या विचलित होना)- धन के आगे ईमान का भी आसन डोल जाया करता है।
          • आसमान टूट पड़ना (गजब का संकट पड़ना)- पाँच लोगों को खिलाने-पिलाने में ऐसा क्या आसमान टूट पड़ा कि तुम सारा घर सिर पर उठाये हो ?
          • आसमान दिखाना- (पराजित करना)
          • आसमान से बातें करना (बहुत ऊँचा होना)- आजकल ऐसी ऐसी इमारते बनने लगी है, जो आसमान से बातें करती है।
          • आस्तीन का साँप (कपटी मित्र)- उससे सावधान रहो। आस्तीन का साँप है वह।
          • इधर-उधर करना- (टालमटोल करना)
          • इन्द्र का अखाड़ा-(ऐश-मौज की जगह)
          • ईंट का जबाब पत्थर से देना (जबरदस्त बदला लेना)- भारत अपने दुश्मनों को ईंट का जबाब पत्थर से देगा।
          • ईंट से ईंट बजाना (युद्धात्मक विनाश लाना )- शुरू में तो हिटलर ने यूरोप में ईट-से-ईट बजा छोड़ी, मगर बाद में खुद उसकी ईंटे बजनी लगी।
          • ईद का चाँद होना (बहुत दिनों बाद दिखाई देना)- तुम तो कभी दिखाई ही नहीं देते, तुम्हे देखने को तरस गया, ऐसा लगता है कि तुम ईद के चाँद हो गए हो।
          • उड़ती चिड़िया पहचानना (मन की या रहस्य की बात ताड़ना )- कोई मुझे धोखा नही दे सकता। मै उड़ती चिड़िया पहचान लेता हुँ।
          • उन्नीस बीस का अंतर होना (एक का दूसरे से कुछ अच्छा होना )- दोनों गाये बस उन्नीस-बीस है।
          • उलटी गंगा बहाना (अनहोनी हो जाना)- राम किसी से प्रेम से बात कर ले, तो उलटी गंगा बह जाए।
          • एँड़ी-चोटी का पसीना एक करना- (खूब परिश्रम करना)
          • एक आँख न भाना- (तनिक भी अच्छा न लगना)
          • एक आँख से देखना (बराबर मानना )- प्रजातन्त्र वह शासन है जहाँ कानून मजदूरी अवसर इत्यादि सभी मामले में अपने सदस्यों को एक आँख से देखा जाता है।
          • एक न चलना- (कोई उपाय सफल न होना)
          • एक लाठी से सबको हाँकना (उचित-अनुचित का बिना विचार किये व्यवहार)- समानता का अर्थ एक लाठी से सबको हाँकना नहीं है, बल्कि सबको समान अवसर और जीवन-मूल्य देना है।
          • एक से तीन बनाना- (खूब नफा करना)
          • ओखली में सिर देना- इच्छापूर्वक किसी झंझट में पड़ना, कष्ट सहने पर उतारू होना)
          • ओस के मोती- (क्षणभंगुर)
          • कचूमर निकालना- (खूब पीटना)
          • कटे पर नमक छिड़कना- विपत्ति के समय और दुःख देना)
          • कण पकरना (बाज आना)- कान पकड़ो की फिर ऐसा काम न करोगे।
          • कन्नी काटना- (आँख बचाकर भाग जाना)
          • कपास ओटना- (सांसरिक काम-धन्धों में लगे रहना)
          • कमर कसना (तैयार होना)- शत्रुओं से लड़ने के लिए भारतीयों को कमर कसकर तैयार हो जाना चाहिए
          • कमर टूटना (बेसहारा होना )- जवान बेटे के मर जाने बाप की कमर ही टूट गयी।
          • करवटें बदलना- (अड़चन डालना)
          • कल पड़ना (चैन मिलना)- कल रात वर्षा हुई, तो थोड़ी कल पड़ी।
          • कलई खुलना- (भेद प्रकट होना)
          • कलम तोड़ना (बढ़िया लिखना)- वाह ! क्या अच्छा लिखा है। तुमने तो कलम तोड़ दी।
          • कलेजा फटना- (दिल पर बेहद चोट पहुँचना)
          • कलेजा मुँह का आना (भयभीत होना )- गुंडे को देख कर उसका कलेजा मुँह को आ गया
          • कलेजे पर साँप लोटना (डाह करना )- जो सब तरह से भरा पूरा है, दूसरे की उत्रति पर उसके कलेजे पर साँप क्यों लोटे।
          • काँटा निकलना (बाधा दूर होना)- उस बेईमान से पल्ला छूटा। चलो, काँटा निकला।
          • काँटे बोना- (बुराई करना)
          • काँटों में घसीटना- (संकट में डालना)
          • कागज काला करना (बिना मतलब कुछ लिखना)- वारिसशाह ने अपनी 'हीर' के शुरू में ही प्रार्थना की है- रहस्य की बात लिखनेवालों का साथ दो, कागज काला करनेवालों का नहीं।
          • कागजी घोड़े दौड़ाना (केवल लिखा-पढ़ी करना, पर कुछ काम की बात न होना)- आजकल सरकारी दफ्तर में सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ते है; होता कुछ नही।
          • काठ मार जाना- (स्तब्ध हो जाना)
          • कान खोलना (सावधान होना)- कान खोलकर सुन लो तिम्हें जुआ नही खेलना है।
          • कान देना (ध्यान देना)- पिता की बातों पर कण दिया करो।
          • काम तमाम करना- (मार डालना)
          • काल के गाल में जाना- (मृत्यु के मुख में पड़ना)
          • काला अक्षर भैंस बराबर- (अनपढ़, निरा मूर्ख)
          • किताब का कीड़ा होना (पढाई के अलावा कुछ न करना )- विद्यार्थी को केवल किताब का कीड़ा नहीं होना चाहिए, बल्कि स्वस्थ शरीर और उत्रत मस्तिष्कवाला होनहार युवक होना है।
          • किनारा करना- (अलग होना)
          • किरकिरा होना (विघ्र आना)- जलसे में उनके शरीक न होने से सारा मजा किरकिरा हो गया।
          • किस खेत की मूली- (अधिकारहीन, शक्तिहीन)
          • किस खेत की मूली (अधिकारहीन, शक्तिहीन)- मेरे सामने तो बड़ों-बड़ों को झुकना पड़ा है। तुम किस खेत की मूली हो ?
          • किस मर्ज की दवा (किस काम के)- चाहते हो चपरासीगीरी और साइकिल चलाओगे नहीं। आखिर तुम किस मर्ज की दवा हो?
          • कीचड़ उछालना- (निन्दा करना)
          • कुआँ खोदना (हानि पहुँचाने के यत्न करना)- जो दूसरों के लिये कुआँ खोदता है उसमे वह खुद गिरता है।
          • कुत्ते की मौत मरना (बुरी तरह मरना)- कंस की किस्मत ही ऐसी थी। कुत्ते की मौत मरा तो क्या।
          • कोदो देकर पढ़ना- (अधूरी शिक्षा पाना)
          • कोल्हू का बैल- (खूब परिश्रमी)
          • कोसों दूर भागना (बहुत अलग रहना)- शराब की क्या बात, मै तो भाँग से कोसों दूर भागता हुँ।
          • कोहराम मचाना- (दुःखपूर्ण चीख -पुकार)
          • कौड़ी का तीन समझना- (तुच्छ समझना)
          • कौड़ी काम का न होना- (किसी काम का न होना)
          • कौड़ी के मेल बिकना- (बहुत सस्ता बिकना)
          • कौड़ी-कौड़ी जोड़ना- (छोटी-मोटी सभी आय को कंजूसी के साथ बचाकर रखना)
          • खटाई में पड़ना (झमेले में पड़ना, रुक जाना)- बात तय थी, लेकिन ऐन मौके पर उसके मुकर जाने से सारा काम खटाई में पड़ गया।
          • खटिया सेना- (बीमार होना)
          • खम खाना- (दबना, नष्ट होना)
          • खरी-खोटी सुनाना (भला-बुरा कहना)- कितनी खरी-खोटी सुना चुका हुँ, मगर बेकहा माने तब तो ?
          • ख़ाक छानना (भटकना)- नौकरी की खोज में वह खाक छानता रहा।
          • खाक में मिलना- (बर्बाद होना)
          • खा-पका जाना- (बर्बाद करना)
          • खार खाना- (डाह करना)
          • खुशामदी टट्टू- (मुँहदेखी करना)
          • खूँटे के बल कूदना- (किसी के भरोसे पर जोर या जोश दिखाना)
          • खून का प्यासा (जानी दुश्मन होना)- उसकी क्या बात कर रहे हो, वह तो मेरे खून का प्यासा हो गया है।
          • खून खौलना (क्रोधित होना)- झूठ बातें सुनते ही मेरा खून खौलने लगता है।
          • खून पीना- (मार डालना, सताना )
          • खून सफेद हो जाना- (बहुत डर जाना)
          • खून सवार होना- (किसी को मार डालने के लिए तैयार होना)
          • खून सूखना- (अधिक डर जाना)
          • खून-पसीना एक करना (अधिक परिश्रम करना)- खून पसीना एक करके विद्यार्थी अपने जीवन में सफल होते है।
          • खेत रहना या आना (वीरगति पाना)- पानीपत की तीसरी लड़ाई में इतने मराठे आये कि मराठा-भूमि जवानों से खाली हो गयी।
          • खेल खेलाना- (परेशान करना)
          • खेल खेलाना (परेशान करना)- खेल खेलाना छोड़ो और साफ-साफ कहो कि तुम्हारा इरादा क्या है।
          • ख्याली पुलाव- (सिर्फ कल्पना करना)
          • गंगा लाभ होना- (मर जाना)
          • गज भर की छाती होना- (उत्साहित होना)
          • गड़े मुर्दे उखाड़ना (दबी हुई बात फिर से उभारना)- जो हुआ सो हुआ, अब गड़े मुर्दे उखारने से क्या लाभ ?
          • गढ़ा खोदना- (हानि पहुँचाने का उपाय करना)
          • गतालखाते में जाना-(नष्ट होना)
          • गर्दन पर छुरी चलाना (नुकसान पहुचाना)- मुझे पता चल गया कि विरोधियों से मिलकर किस तरह मेरे गले पर छुरी चला रहे थेो।
          • गर्दन पर सवार होना (पीछा ना छोड़ना )- जब देखो, तुम मेरी गर्दन पर सवार रहते हो।
          • गला छूटना (पिंड छोड़ना)- उस कंजूस की दोस्ती टूट ही जाती, तो गला छूटता।
          • गले का हार होना(बहुत प्यारा)- लक्ष्मण राम के गले का हर थे।
          • गाँठ में बाँधना (खूब याद रखना )- यह बात गाँठ में बाँध लो, तन्दुरुस्ती रही तो सब रहेगा।
          • गागर में सागर भरना (एक रंग -ढंग पर न रहना)- उसका क्या भरोसा वह तो गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
          • गाढ़े में पड़ना- (संकट में पड़ना)
          • गाल बजाना- (डींग मारना)
          • गाल बजाना (डींग हाँकना)- जो करता है, वही जानता है। गाल बजानेवाले क्या जानें ?
          • गिन-गिनकर पैर रखना (सुस्त चलना, हद से ज्यादा सावधानी बरतना)- माना कि थक गये हो, मगर गिन-गिनकर पैर क्या रख रहे हो ? शाम के पहले घर पहुँचना है या नहीं ?
          • गिरगिट की तरह रंग बदलना (बातें बदलना)- गिरगिट की तरह रंग बदलने से तुम्हारी कोई इज्जत नहीं करेगा।
          • गीदड़भभकी- (मन में डरते हुए भी ऊपर से दिखावटी क्रोध करना)
          • गुड़ गोबर करना- (बनाया काम बिगाड़ना)
          • गुड़ियों का खेल- (सहज काम)
          • गुदड़ी का लाल (गरीब के घर में गुणवान का उत्पत्र होना)- अपने वंश में प्रेमचन्द सचमुच गुदड़ी के लाल थे।
          • गुरुघंटाल- (बहुत चालाक)
          • गुल खिलना (नयी बात का भेद खुलना, विचित्र बातें होना)- सुनते रहिये, देखिये अभी क्या गुल खिलेगा।
          • गुस्सा पीना (क्रोध दबाना)- गुस्सा पीकर रह गया। चाचा का वह मुँहलगा न होता, तो उसकी गत बना छोड़ता।
          • गूलर का कीड़ा- (सीमित दायरे में भटकना)
          • गूलर का फूल होना (लापता होना)- वह तो ऐसा गूलर का फूल हो गया है कि उसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है।
          • गोटी लाल होना- (लाभ होना)
          • घड़ो पानी पड़ जाना (अत्यन्त लज्जित होना )- वह हमेशा फस्ट क्लास लेता था मगर इस बार परीक्षा में चोरी करते समय रँगे हाथ पकड़े जाने पर बच्चू पर घोड़े पड़ गया।
          • घर का आदमी-(कुटुम्ब, इष्ट-मित्र)
          • घर का उजाला- (कुलदीप)
          • घर का न घाट का (कहीं का नहीं)- कोई काम आता नही और न लगन ही है कि कुछ सीखे-पढ़े। ऐसा घर का न घाट का जिये तो कैसे जिये।
          • घर का मर्द- (बाहर डरपोक)
          • घर बसाना (विवाह करना)- उसने घर क्या बसाया, बाहर निकलता ही नहीं।
          • घाट-घाट का पानी पीना- (अच्छे-बुरे अनुभव रखना)
          • घात लगाना (मौका ताकना)- वह चोर दरवान इसी दिन के लिए तो घात लगाये था, वर्ना विश्र्वास का ऐसा रँगीला नाटक खेलकर सेठ की तिजोरी-चाबी तक कैसे समझे रहता ?
          • घातपर चढ़ना- (तत्पर रहना)
          • घाव पर नमक छिड़कना (दुःख में दुःख देना)- राम वैसे ही दुखी है, तुम उसे परेशान करके घाव पर नमक छिड़क रहे हो।
          • घाव हरा होना- (भूले हुए दुःख को याद करना)
          • घास खोदना- (व्यर्थ काम करना)
          • घी के दीए जलाना (अप्रत्याशित लाभ पर प्रसत्रता)- जिससे तुम्हारी बराबर ठनती रही, वह बेचारा कल शाम कूच कर गया। अब क्या है, घी के दीये जलाओ।
          • घोड़े बेचकर सोना (बेफिक्र होना)- बेटी तो ब्याह दी। अब क्या, घोड़े बेचकर सोओ।
          • चकमा देना- (धोखा देना)
          • चण्डूखाने की गप- (झूठी गप)
          • चम्पत हो जाना- (भाग जाना)
          • चरबी छाना- (घमण्ड होना)
          • चल निकलना- (प्रगति करना, बढ़ना)
          • चल बसना (मर जाना)- बेचारे का बेटा भरी जवानी में चल बसा।
          • चलता-पुर्जा- (काफी चालाक)
          • चहरे पर हवाइयाँ उड़ना (डरना, घबराना)- साम्यवाद का नाम सुनते ही पूँजीपतियों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती है।
          • चाँद का टुकड़ा- (बहुत सुन्दर)
          • चाँद पर थूकना (व्यर्थ निन्दा या सम्माननीय का अनादर करना)- जिस भलेमानस ने कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, उसे ही तुम बुरा-भला कह रहे हो ?भला, चाँद पर भी थूका जाता है ?
          • चाँदी का जूता- (रूपये का जोर)
          • चाँदी काटना (खूब आमदनी करना)- कार्यालय में बाबू लोग खूब चाँदी काट रहे है।
          • चाचा बनाना- (दण्ड देना)
          • चादर से बाहर पैर पसारना (आय से अधिक व्यय करना)- डेढ़ सौ ही कमाते हो और इतनी खर्चीली लतें पाल रखी है। चादर के बाहर पैर पसारना कौन-सी अक्लमन्दी है ?
          • चार चाँद लगाना (चौगुनी शोभा देना)- निबन्धों में मुहावरों का प्रयोग करने से चार चाँद लग जाता है।
          • चार दिन की चाँदनी (थोड़े दिन का सुख)- राजा बलि का सारा बल भी जब चार दिन की चाँदनी ही रहा, तो तुम किस खेत की मूली हो ?
          • चिकना घड़ा होना (बेशर्म होना)- तुम ऐसा चिकना घड़ा हो तुम्हारे ऊपर कहने सुनने का कोई असर नहीं पड़ता।
          • चिकने घड़े पर पानी पड़ना- (उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ना)
          • चिराग तले अँधेरा (पण्डित के घर में घोर मूर्खता आचरण )- पण्डितजी स्वयं तो बड़े विद्वान है, किन्तु उनके लड़के को चिराग तले अँधेरा ही जानो।
          • चींटी के पर जमना- (ऐसा काम करना जिससे हानि या मृत्यु हो
          • चींटी के पर लगना या जमना (विनाश के लक्षण प्रकट होना)- इसे चींटी के पर जमना ही कहेंगे कि अवतारी राम से रावण बुरी तरह पेश आया।
          • चुनौती देना- (ललकारना)
          • चुल्लू भर पानी में डूब मरना- (अत्यन्त लज्जित होना)
          • चूँ न करना (सह जाना, जवाब न देना)- वह जीवनभर सारे दुःख सहता रहा, पर चूँ तक न की।
          • चूड़ियाँ पहनना (स्त्री की-सी असमर्थता प्रकट करना)- इतने अपमान पर भी चुप बैठे हो! चूड़ियाँ तो नहीं पहन रखी है तुमने ?
          • चैन की बंशी बजाना (मौज करना)- आजकल राम चैन की बंशी बजा रहा है।
          • चैन की वंशी बजाना- (सुख से समय बिताना)
          • चोटी का पसीना एँड़ी तक बहना- (खूब परिश्रम करना)
          • चोली-दामन का साथ- (काफी घनिष्ठता)
          • छः पाँच करना- (आनाकानी करना)
          • छक्के छुड़ाना- (खूब परेशान करना)
          • छक्के छूटना (बुरी तरह पराजित होना)- महाराजकुमार विजयनगरम की विकेट-कीपरी में अच्छे-अच्छे बॉलर के छक्के छूट चुके है।
          • छठी का दूध याद करना- (सुख भूल जाना)
          • छप्पर फाडकर देना (बिना मेहनत का अधिक धन पाना)- ईश्वर जिसे देता है, उसे छप्पर फाड़कर देता है।
          • छाती पर पत्थर रखना (कठोर ह्रदय)- उसने छाती पर पत्थर रखकर अपने पुत्र को विदेश भेजा था।
          • छाती पर मूँग या कोदो दलना- (कष्ट देना)
          • छाती पर सवार होना (आ जाना)- अभी वह बात कर रही थी कि बच्चे उसके छाती पर सवार हो गए।
          • छाती पर साँप लोटना- (किसी के प्रति डाह)
          • छोटी मुँह बड़ी बात- (योग्यता से बढ़कर बोलना)
          • जंगल में मंगल करना- (शून्य स्थान को भी आनन्दमय कर देना)
          • जड़ उखाड़ना- (पूर्ण नाश करना)
          • जबान में लगाम न होना- (बिना सोचे-समझे बोलना)
          • जमीन आसमान एक करना (बहुत प्रयन्त करना)- मै शहर में अच्छा मकान लेने के लिए जमीन आसमान एक कर दे रहा हूँ परन्तु सफलता नहीं मिल रही है।
          • जमीन का पैरों तले से निकल जाना- (सन्नाटे में आना)
          • जमीन चूमने लगा- (धराशायी होना)
          • जलती आग में घी डालना (क्रोध बढ़ाना)- बहन ने भाई की शिकायत करके जलती आग में भी डाल दिया।
          • जहर उगलना (द्वेषपूर्ण बात करना )- पडोसी देश चीन और पाकिस्तान हमारे देश के प्रति हमेशा जहर उगलते रहते है।
          • जान खाना- (तंग करना)
          • जान पर खेलना (साहसिक कार्य )- हम जान पर खेलकर भी अपने देश की रक्षा करेंगे।
          • जी का जंजाल होना- (अच्छा न लगना)
          • जी खट्टा होना- (खराब अनुभव होना)
          • जी चुराना- (कोशिश न करना)
          • जी टूटना- (दिल टूटना)
          • जी लगना- (मन लगना)
          • जीती मक्खी निगलना- (जान-बूझकर बेईमानी या कोई अशोभनीय कार्य करना)
          • जूते चाटना (चापलूसी करना )- अफसरों के जूते चाटते -चाटते वह थक गया ,मगर कोई फल न निकला।
          • झक मारना (विवश होना)- दूसरा कोई साधन नहीं हैै। झक मारकर तुम्हे साइकिल से जाना पड़ेगा।
          • झाड़ मारना- (घृणा करना)
          • टका सा जबाब देना ( साफ़ इनकार करना)- मै नौकरी के लिए मैनेज़र से मिला लेकिन उन्होंने टका सा जबाब दे दिया।
          • टका-सा मुँह लेकर रह जाना- (लज्जित हो जाना)
          • टट्टी की आड़ में शिकार खेलना- (छिपकर बुरा काम करना)
          • टस से मस न होना ( कुछ भी प्रभाव न पड़ना)- दवा लाने के लिए मै घंटों से कह रहा हूँ, परन्तु आप आप टस से मस नहीं हो रहे हैं।
          • टाँग अड़ाना (अड़चन डालना)- हर बात में टाँग ही अड़ाते हो या कुछ आता भी है तुम्हे ?
          • टाट उलटना- (व्यापारी का अपने को दिवालिया घोषित कर देना)
          • टुकड़ों पर पलना- (दूसरों की कमाई पर गुजारा करना)
          • टें-टें-पों-पों - (व्यर्थ हल्ला करना)
          • टेढ़ी खीर- (कठिन काम)
          • टोपी उछालना (अपमान करना)- अपने घर को देखो ,दूसरों की टोपी उछालने से क्या लाभ ?
          • ठगा-सा- (भौंचक्का-सा)
          • ठठेरे-ठठेरे बदला- (समान बुद्धिवाले से काम पड़ना)
          • ठन-ठन गोपाल- (मूर्ख, गरीब, कुछ नहीं)
          • डकार जाना ( हड़प जाना)- सियाराम अपने भाई की सारी संपत्ति डकार गया।
          • डींग हाँकना- (शेखी बघारना)
          • डूबते को तिनके का सहारा- (संकट में पड़े को थोड़ी मदद)
          • डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना- (अलग-अलग होकर काम करना)
          • डोरी ढीली करना- (सँभालकर काम न करना)
          • ढील देना- (अधीनता में न रखना)
          • ढेर करना- (मारकर गिरा देना)
          • ढेर होना- (मर जाना)
          • ढोल पीटना- (जाहिर करना)
          • तंग करना- (हैरान करना)
          • तंग हाथ होना- (निर्धन होना)
          • तरह देना- (ख्याल न करना)
          • तलवे चाटना या सहलाना- (खुशामद करना)
          • तह देना- (दवा देना)
          • तह-पर-तह देना- (खूब खाना)
          • ताक में रहना- (खोज में रहना)
          • ताड़ जाना- (समझ जाना)
          • ताना मारना-(व्यंग्य वचन बोलना)
          • तारे गिनना- (दुर्दशाग्रस्त होना, काफी चोट पहुँचना)
          • तिनके को पहाड़ करना- (छोटी बात को बड़ी बनाना)
          • तिल का ताड़ बनाना (बात को तूल देना)- सिर्फ बेहूदा, मगर मुहल्लेवालों ने यह तिल का तार कर दिया कि मैने उसे दुनयाभर गालियाँ दी।
          • तीन तरह करना या होना- (नष्ट करना, तितर बितर करना)
          • तुक में तुक मिलाना- (खुशामद करना)
          • तूती बोलना (प्रभाव जमाना )- आजकल तो आपकी ही तूती बोल रही है।
          • तेवर बदलना- (क्रोध करना)
          • तोते की तरह आँखें फेरना- (बेमुरौवत होना)
          • थाली का बैंगन होना- (जिसका विचार स्थिर न रहे)
          • थूक कर चाटना (बात देकर फिरना )- मै राम की तरह थूक कर चाटना वाला नहीं हूँ।
          • थू-थू करना- (घृणा प्रकट करना)
          • दम टूटना (मर जाना )- शेर ने एक ही गोली में दम तोड़ दिया।
          • दम मारना- (विश्राम करना)
          • दम में दम आना- (राहत होना)
          • दाँव खेलना- (धोखा देना)
          • दायें-बायें देखना- (सावधान होना)
          • दाल गलना- (कामयाब होना, प्रयोजन सिद्ध होना)
          • दाल में काला होना (संदेह होना ) - हम लोगों की ओट में ये जिस तरह धीरे -धीरे बातें कर रहें है, उससे मुझे दाल में काला लग रहा है।
          • दिन दूना रात चौगुना (खूब उनती )- योजनाओं के चलते ही देश का विकास दिन दूना रात चौगुना हुआ।
          • दिनों का फेर होना- (बुरे दिन आना)
          • दिमाग खाना- (बकवास करना)
          • दिल टूटना- (साहस टूटना)
          • दिल दरिया होना- (उदार होना)
          • दिल बढ़ाना- (साहस भरना)
          • दीदे का पानी ढल जाना- (बेशर्म होना)
          • दुकान बढ़ाना- (दूकान बंद करना)
          • दूज का चाँद होना- (कम दर्शन होना)
          • दूध का दूध पानी का पानी- (निष्पक्ष न्याय)
          • दूध के दाँत न टूटना- (ज्ञान और अनुभव का न होना)
          • दूध के दाँत न टूटना (ज्ञानहीन या अनुभवहीन)- वह सभा में क्या बोलेगा ? अभी तो उसके दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं।
          • दो कौड़ी का आदमी (तुच्छ या अविश्र्वसनीय व्यक्ति)- किस दो कौड़ी के आदमी की बात करते हो ?
          • दो टूक बात कहना (स्पष्ट कह देना)- अंगद ने रावण से दो टूक बात कही।
          • दो दिन का मेहमान (जल्द मरनेवाला)- किसी का क्या बिगाड़ेगा ? वह बेचारा खुद दो दिन का मेहमान है।
          • दो नाव पर पैर रखना- (इधर भी, उधर भी, दो पक्षों से मेल रखना)
          • दौड़-धूप करना (बड़ी कोशिश करना)- कौन बाप अपनी बेटी के ब्याह के लिए दौड़-धूप नहीं करता ?
          • धज्जियाँ उड़ाना (किसी के दोषों को चुन-चुनकर गिनाना)- उसने उनलोगों की धज्जियाँ उड़ाना शुरू किया कि वे वहाँ से भाग खड़े हुए।
          • धता बताना- (टालना, भागना)
          • धरती पर पाँव न रखना- (घमंडी होना)
          • धाक जमाना- (रोब होना)
          • धुँआ-सा मुँह होना- (लज्जित होना)
          • धूप में बाल सफेद करना- (बिना अनुभव प्राप्त किये बूढा होना)
          • धूल छानना- (मारे-मारे फिरना)
          • धोती ढीली होना- (डर जाना)
          • धोबी का कुत्ता- (निकम्मा)
          • न इधर का, न उधर का (कही का नही )- कमबख्त ने न पढ़ा, न बाप की दस्तकारी सीखी; न इधर रहा, न उधर का।
          • नजर चुराना- (आँख चुराना)
          • नजर पर चढ़ना- (पसंद आ जाना)
          • नदी-नाव संयोग- (ऐसी भेंट/मुलाकात जो कभी इत्तिफाक से हो जाय)
          • नमक अदा करना- (फर्ज पूरा करना, प्रत्युपकार करना)
          • नमक-मिर्चा लगाना- (बढ़ा-चढ़ाकर कहना)
          • नशा उतरना- (घमण्ड उतरना)
          • नसीब चमकना- (भाग्य चमकना)
          • नाक का बल होना (बहुत प्यारा होना )- इन दिनों हरीश अपने प्रधानाध्यापक की नाक का बल बना हुआ है।
          • नाक काटना (इज्जत जाना )- पोल खुलते ही सबके सामने उसकी नाक कट गयी।
          • नाकों डीएम करना (परेशान करना )- पिछली लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को नाकों दम कर दिया।
          • नाच नचाना- (तंग करना)
          • निन्यानबे के फेर में पड़ना- (धन जमा करने के चक्कर में पड़ना)
          • नींद हराम होना- (तंग आना, सो न सकना)
          • नुक़्ताचीनी करना- (दोष दिखाना, आलोचना करना)
          • नेकी और पूछ-पूछ- (बिना कहे ही भलाई करना)
          • नौ-दो ग्यारह होना (चम्पत होना )- लोग दौड़े कि चोर नौ-दो ग्यारह हो गये।
          • पगड़ी उतारना- (इज्जत उतारना)
          • पगड़ी रखना (इज्जत बचाना)- हल्दीघाटी में झाला सरदार ने राजपूतों की पगड़ी रख ली।
          • पट्टी पढ़ाना (बुरी राय देना)- तुमने मेरे बेटे को कैसी पट्टी पढ़ाई कि वह घर जाता ही नहीं ?
          • पते की कहना- (रहस्य या चुभती हुई काम की बात कहना)
          • पहलू बचाना- (कतराकर निकल जाना)
          • पहाड़ टूट पड़ना (भारी विपत्ति आना )- उस बेचारे पर तो दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा।
          • पाँचों उँगलियाँ घी में (पूरे लाभ में)- पिछड़े देशों में उद्योगियों और मेहनतकशों की हालत पतली रहती है तथा दलालों, कमीशन एजेण्टों और नौकरशाहों की ही पाँचों उँगलियाँ घी में रहता हैं।
          • पाकेट गरम करना- (घूस देना)
          • पानी उतरना (इज्जत लेना )- भरी सभा में द्रोपदी को पानी उतारने की कोशिश की गयी।
          • पानी करना- (सरल कर देना)
          • पानी का बुलबुला- (क्षणभंगुर वस्तु)
          • पानी की तरह बहना- (अन्धाधुन्ध करना)
          • पानी देना- (तर्पण करना, सींचना)
          • पानी न माँगना- (तत्काल मर जाना)
          • पानी पर नींव डालना- (ऐसी वस्तु को आधार बनाना जो टिकाऊ न हो)
          • पानी पीकर जाति पूछना- (कोई काम कर चुकने के बाद उसके औचित्य का निर्णय करना)
          • पानी फिर जाना- (बर्बाद होना)
          • पानी में आग लगाना- (असंभव कार्य करना)
          • पानी रखना- (मर्यादा की रक्षा करना)
          • पानी लगना (कहीं का)- (स्थान विशेष के बुरे वातावरण का असर होना )
          • पानी लेना- (अप्रतिष्ठित करना)
          • पानी-पानी करना- (लज्जित करना)
          • पानी-पानी होना- (अधिक लज्जित होना)
          • पापड़ बेलना- (दुःख से दिन काटना)
          • पीठ ठोंकना- (साहस बँधाना)
          • पीठ दिखलाना- (पलायन)
          • पुरानी लकीर का फकीर होना/पुरानी लकीर पीटना- (पुरानी चाल मानना)
          • पेट काटना (अपने भोजन तक में बचत )- अपना पेट काटकर वह अपने छोटे भाई को पढ़ा रहा है।
          • पेट में चूहे कूदना (जोर की भूख )- पेट में चूहे कूद रहे है। पहले कुछ खा लूँ, तब तुम्हारी सुनूँगा।
          • पैर पकड़ना- (क्षमा चाहना)
          • पोल खुलना- (रहस्य प्रकट करना)
          • पौ बारह होना (खूब लाभ होना)- क्या पूछना है ! आजकल तुम व्यापारियों के ही तो पौ बारह हैं।
          • फफोले फोड़ना- (वैर साधना)
          • फबतियाँ कसना- (ताना मारना)
          • फूंक-फूंक कर कदम रखना- (सावधान होकर काम करना)
          • फूटी आँखों न भाना- (तनिक भी न सुहाना)
          • फूल झड़ना- (मधुर बोलना)
          • फूलना-फलना (धनवान या कुलवान होना)- मेरा आशीर्वाद है; सदा फूलो-फलो।
          • फूला न समाना- (काफी खुश होना)
          • बगलें झाँकना- (बचाव का रास्ता ढूँढना)
          • बगुला भगत-(कपटी)
          • बन्दरघुड़की देना- (धमकाना)
          • बहती गंगा में हाथ धोना- (वह मौका हाथ से न जाने देना जिससे सभी लाभ उठाते हों)
          • बाँसो उछलना- (काफी खुश होना)
          • बाग-बाग होना- (खुश होना)
          • बाजार गर्म होना- (सरगर्मी होना, तेजी होना)
          • बाजी ले जाना या मारना (जीतना)- देखें, दौड़ में कौन बाजी ले जाता या मारता है।
          • बात का धनी- (वादे का पक्का, दृढप्रतिज्ञ)
          • बात की बात में- (अतिशीघ्र)
          • बात चलाना- (चर्चा करना)
          • बात न पूछना- (निरादार करना)
          • बात पर न जाना- (विश्वास न करना)
          • बात पी जाना-(बर्दाश्त करना, सुनकर भी ध्यान न देना)
          • बात बनाना- (बहाना करना)
          • बात बनाना (बहाना बनाना)- तुम हर काम में बात बनाना जानते है।
          • बात रहना- (वचन पूरा करना)
          • बातों में उड़ाना- (हँसी-मजाक में उड़ा देना)
          • बायें हाथ का खेल- (सरल होना)
          • बाल की खाल निकालना- (छिद्रान्वेषण करना)
          • बालू की भीत- (शीघ्र नष्ट होनेवाली चीज)
          • बीड़ा उठना (दायित्व लेना)- गांधजी ने भारत को आजाद करने का बीड़ा उठाया था।
          • बेसिर-पैर की बात-(निराधार बात)
          • बोलबाला- (प्रसिद्ध)
          • भनक पड़ना- (उड़ती हुई खबर सुनना)
          • भाड़ झोंकना- (समय नष्ट करना)
          • भाड़े का टट्टू- (गया-बीता)
          • भारी लगना- (असहय होना)
          • भीगी बिल्ली होना (डर से दबना)- वह अपने शिक्षक के सामने भीगी बिल्ली हो जाता है।
          • भूत चढ़ना या सवार होना- (किसी बात की जिद पकड़ना, रंज के मारे आगा-पीछा भूल जाना)
          • भेड़ियाधसान होना-(देखा-देखी करना)
          • मन के लड्डू खाना- (व्यर्थ की आशा पर प्रसन्न होना)
          • मन खट्टा होना- (मन फिर जाना)
          • मन चलना- (इच्छा होना)
          • मन फट जाना- (विराग होना, फीका पड़ना)
          • मर मिटना- (बर्बाद होना)
          • मांस नोचना- (तंग करना)
          • मिट्टी के मोल बिकना(बहुत सस्ता)- यह मकान मिट्टी के मोल बिक गया
          • मिट्टी पलीद करना- (जलील करना)
          • मिट्टी में मिलना- (नष्ट होना)
          • मीन-मेख करना- (व्यर्थ तर्क)
          • मुँह धो रखना (आशा न रखना)- यह चीज अब मिलने को नही मुँह धो रखिए।
          • मुँह बंद कर देना (शांत कराना)- तुम धमकी देकर मेरा मुँह बंद कर देना चाहते हो
          • मुँह में पानी आना (लालच होना)- मिठाई देखते ही उसके मुँह में पानी भर आया।
          • मुट्ठी गरम करना (घूस देना)- पुलिस की मुठ्ठी गरम करो ,तो काम होगा।
          • मुठभेड़ होना- (मुकाबला होना)
          • मैदान मारना (बाजी जीतना)- पानीपत की लड़ाई में आखिर अब्दाली ही मैदान मारा।
          • मैदान साफ होना- (मार्ग में बाधा न होना)
          • मोटा आसामी- (मालदार आदमी)
          • मोम हो जाना- (खूब नरम बन जाना)
          • यश गाना- (प्रशंसा करना, एहसान मानना)
          • यश मानना- (कृतज्ञ होना)
          • युगधर्म- (समय के अनुसार चाल या व्यवहार)
          • युग-युग- (बहुत दिनों तक)
          • युगांतर उपस्थित करना- (किसी पुरानी प्रथा को हटाकर उसके स्थान पर नई प्रथा चलाना)
          • रंग उतरना (फीका होना)- सजा सुनते ही अपराधी के चेहरे का रंग उतर गया।
          • रंग जमना (धाक जमना)- तुम्हारा तो कल खूब रंग जमा।
          • रंग बदलना (परिवर्तन होना)- जमाने का रंग बदल गया है।
          • रंग में भंग होना- (आनन्द में बिघ्न पड़ना)
          • रंग लाना- (प्रभाव दिखाना)
          • रंगा सियार- (ढोंगी)
          • रफूचक्कर होना- (भाग जाना)
          • रसातल चला जाना- (एकदम नष्ट हो जाना)
          • राई से पर्वत होना- (छोटे से बड़ा होना)
          • रीढ़ टूटना- (आधार समाप्त होना)
          • रोटियाँ तोड़ना- (बैठे-बैठे खाना)
          • रोना रोना- (दुखड़ा सुनाना)
          • लँगोटिया यार- (बचपन का दोस्त)
          • लँगोटी पर (में) फाग खेलना- (अल्पसाधन होते हुए भी विलासी होना)
          • लकीर का फकीर होना (पुरानी प्रथा पर ही चलना)- ये अबतक लकीर के फकीर ही है। टेबुल पर नही, चौके में ही खायेंगे।
          • लग्गी से घास डालना- (दूसरों पर टालना)
          • लल्लो-चप्पो करना- (खुशामद करना, चिरौरी करना)
          • लहू का घूंट पीना- (बर्दाश्त करना)
          • लहू होना- (मुग्ध होना)
          • लाख से लाख होना- (कुछ न रह जाना)
          • लाल-पीला होना- (रंज होना)
          • लाले पड़ना- (मुँहताज होना)
          • लुटिया डुबोना- (काम बिगाड़ना)
          • लेने के देने पड़ना (लाभ के बदले हानि)- नया काम हैं। सोच-समझकर आगे बढ़ना। कहीं लेने के देने न पड़ जायें।
          • लोहा बजना- (युद्ध होना)
          • लोहा मानना (श्रेष्ठ समझना)- आज दुनिया भरतीय जवानों का लोहा मानती है।
          • लोहे के चने चबाना ( कठिनाई झेलना)- भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना को लोहे के चने चबाने पड़े।
          • वक़्त पर काम आना- (विपत्ति में मदद करना)
          • वचन देना- (जबान देना)
          • वचन हारना- (जबान हारना)
          • शर्म से गड़ जाना- (अधिक लज्जित होना)
          • शर्म से पानी-पानी होना- (बहुत लजाना)
          • शान में बट्टा लगना- (इज्जत में धब्बा लगना)
          • शिकार हाथ लगना- (असामी मिलना)
          • शेखी बघारना- (डींग हाँकना)
          • शौतान की आँत- (बहुत बड़ा)
          • शौतान की खाला- (झगड़ालू स्त्री)
          • श्रीगणेश करना (शुभारम्भ करना)- कोई शुभ दिन देखकर किसी शुभ कर्म का श्रीगणेश करना चाहिए।
          • षटराग (खटराग) अलापना- (रोना-गाना, बखेड़ा शुरू करना, झंझट करना)
          • सन्नाटे में आना/सकेत में आना- (स्तब्ध हो जाना)
          • सफेद झूठ (सरासर झुठ)- यह सफेद झूठ है कि मैंने उसे गाली दी।
          • सब धान बाईस पसेरी- (सबके साथ एक-सा व्यवहार, सब कुछ बराबर समझना)
          • सब्ज बाग दिखाना- (बड़ी-बड़ी आशाएँ दिलाना)
          • समझ (अक्ल) पर पत्थर पड़ना (बुद्धि भ्रष्ट होना)- रावण की समझ पर पत्थर पड़ा था कि भला कहनेवालों को उसने लात मारी।
          • सर गंजा कर देना (खूब पीटना)- भागो यहाँ से, नही तो सर गंजा कर दूँगा।
          • सर धुनना (शोक करना)- राम परीक्षा में असफल होने पर सर धुनने लगी।
          • सर्द हो जाना (डरना, मरना)- बड़ा साहसी बनता था, पर भूत का नाम सुनते ही सर्द हो गया।
          • सवा सोलह आने सही (पूरे तौर पर ठीक)- राम की सेना में हनुमान इसलिए श्रेष्ठ माने जाते थे कि हर काम में वे ही सवा सोलह आने सही उतरते थे।
          • साँप-छछूंदर की हालत (दुविधा)- पिता अलग नाराज है, माँ अलग। किसे क्या कहकर मनाऊँ ?मेरी तो साँप-छछूंदर की हालत है इन दिनों।
          • सात-पाँच करना- (आगे पीछे करना)
          • सिक्का जमना (प्रभाव जमना)- आज तुम्हारे भाषण का वह सिक्का जमा कि उसके बाद बाकी वक्ता जमे ही नहीं।
          • सितारा चमकना या बुलंद होना- (भाग्योदय होना)
          • सिप्पा भिड़ाना- (उपाय करना)
          • सिर खुजलाना (बहलाना करना)- सिर न खुजलाओ, देना है तो दो।
          • सिर पर आ जाना (बहुत नजदीक होना)- परीक्षा मेरे सिर पर आ गयी है, अब मुझे खूब पढ़ना चाहिए।
          • सुबह का चिराग होना- (समाप्ति पर आना)
          • सैकड़ों घड़े पानी पड़ना- (लज्जित होना)
          • हक्क-बक्का रह जाना- (भौंचक रह जाना)
          • हजामत बनाना- (ठगना)
          • हड़प जाना- (हजम कर जाना)
          • हड्डी-पसली दुरुस्त करना- (खूब मारना)
          • हथियार डाल देना (हार मान लेना)- जब कुछ करते न बना तो उसने हथियार डाल दिये।
          • हल्का होना- (तुच्छ होना, कम होना)
          • हल्दी-गुड़ पिलाना- (खूब मारना)
          • हवा खिलाना- (कहीं भेजना)
          • हवा पर उड़ना- (इतराना)
          • हवा लगना- (संगति का प्रभाव (बुरे अर्थ में)
          • हाथ के तोते उड़ना- (अचानक शोक-समाचार सुनकर स्तब्ध हो जाना)
          • हाथ देना (सहायता करना )- आपके हाथ दिये बिना यह काम न होगा।
          • हाथ पैर मारना (काफी प्रयास )- राम कितना मेहनत क्या फिर भी वह परीक्षा में सफल नहीं हुआ।
          • हाथ मलना (पछताना )- समय बीतने पर हाथ मलने से क्या लाभ ?
          • हाथोहाथ (जल्दी )- यह काम हाथोहाथ होकर रहेगा।
          • हृदय पसीजना- (दयार्द्र होना, द्रवित होना)
          • होश उड़ जाना- (घबड़ा जाना)